खुशियों का पैमाना (व्यंग्य)

ख़ुशी का पैमाना आधा है या पूरा यह जांचने के लिए कामकाज, रिश्ते, शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य, लोकोपकार धर्म और अध्यात्म को आधार बनाया गया। भला न हो उस व्यक्ति का जिसके कारण, हर साल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हैपीनेस इंडेक्स उगाया जाता है।

वक़्त सचमुच बदल गया है। काम करने की शैली बदल रही है। जापान में मुस्कुराना सिखाया जा रहा है और हमारे यहां जाने माने ज्योतिषी सार्वजनिक रूप से समझा रहे हैं कि प्यार करने से पहले भी कुंडली दिखा लेनी चाहिए। कृत्रिम बुद्धि भी इंसान की कुबुद्धि से प्रभावित है। कुछ समय पहले देश के कुछ शहरों में खुशी का स्तर नापने के लिए सर्वे करवाया गया था जो महत्त्वपूर्ण माना गया था। ऐसा लगता है यह सर्वे विदेशों में नियमित होते रहे सर्वे, अध्ययन और शोधों से प्रेरित रहा होगा। खैर, इसका विषय खुशी से जुड़ा हुआ था इसलिए ज़्यादा नाखुश होने की ज़रूरत नहीं रही। हालांकि इस विषय के परिणाम ज़्यादा खुश करने वाले नहीं रहे। सबसे ज़्यादा दुखी होने की बात यह रही कि जिस शहर में स्थित विश्वविद्यालय ने यह सर्वे कराया उस शहर को सबसे खुश शहर का खिताब नहीं मिल पाया। ऐसा लगता है सर्वे के लिए उचित लोगों को नहीं ढूंढा गया।

  

ख़ुशी का पैमाना आधा है या पूरा यह जांचने के लिए कामकाज, रिश्ते, शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य, लोकोपकार धर्म और अध्यात्म को आधार बनाया गया। भला न हो उस व्यक्ति का जिसके कारण, हर साल अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हैपीनेस इंडेक्स उगाया जाता है जिसमें विश्वस्तर पर हमारे देश को अभी भी 136 देशों में 126 वें पायदान पर रहकर खुश रहना है। हालांकि यह पायदान पहले से बेहतर होती जा रही है लेकिन इससे विकासजी बहुत खफा हो जाते हैं। ऐसे सर्वे कराने से लोगों की गलत मनोदशाओं का भेद खुल जाता है। सिर्फ धन दौलत से खुशी तलाशने वालों को सावधान करने का नाटक करना होता है। सर्वे करवाने वालों का यह सपना टूट जाता है कि प्रसन्नमुखी समाज का निर्माण किया जाए। दूसरा सपना यह टूट जाता है कि सत्ता आत्ममंथन करेगी। सर्वे की रिपोर्ट भी ख़्वाब ही होती है। जीडीपी कैसे भी बढाए रखने के ख़्वाब के सामने ऐसे सपने तुच्छ साबित होते हैं।

इस मामले में भूटान सबसे पिछड़ा हुआ देश माना जा सकता है जो ग्रॉस नेशनल हैप्पीनेस इंडेक्स को आधार बनाकर लोगों के जीवन में खुशी बढाने को अपना लक्ष्य मानता है। आर्थिक असंतुलन, बढ़ती महंगाई, बिगड़ी क़ानून व्यवस्था, बढ़ती भौतिक सुविधाओं में चरमराते रिश्ते, जटिल होती जीवन शैली, बिगड़ता स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार जैसे विषयों के आधार पर सर्वे कराकर अनहैप्पीनेस इंडेक्स घोषित किया जाए तो हैप्पीनेस सर्वे करवाने वाले अगला सर्वे करवाना भूल जाएं। वह यह सलाह देना शुरू कर देंगे कि अविवाहित रहें, खाना मुफ्त मिले, कपडे पहनने का झंझट न हो। बाकी जिम्मेवारियां सरकारजी पूरी कर दें और सभी लाभार्थी किस्म के वोटर उसी सरकार को वोट देते रहें। खुशियों का पैमाना, भरा दिखाने के कुछ उपाय यह भी हैं।  

– संतोष उत्सुक

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