अनोखा स्‍कूल… स्ट्रीट लाइट की रोशनी में चलती है क्‍लास, प्रवासी मजदूरों के बच्चों की बदल रही किस्‍मत

धीरेन्द्र चौधरी/रोहतक: 5 सितंबर को हमारे देश में गुरुओं को सम्मान देने के लिए हर साल सरकारी और गैर-सरकारी तौर पर शिक्षक दिवस मनाया जाता है. शिक्षा के क्षेत्र में बेहतरीन योगदान देने वाले शिक्षकों को जिला स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक सम्मानित भी किया जाता है. आज हम एक ऐसी शख्सियत की बात कर रहे हैं, जो किसी सरकारी या प्राईवेट स्कूल में नहीं, बल्कि स्ट्रीट लाईट में बच्चों को पढ़ाते हैं. इनका स्कूल भी सुबह 7 बजे नहीं, बल्कि शाम को 7 बजे लगता है और एक ही कक्षा में आपको पहली से दसवीं तक के विद्यार्थी मिल जाएंगे. 

ये शख्स हैं नरेश कुमार जो पिछले 20 साल से झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाले प्रवासी मजदूरों के बच्चों को फ्री में ट्यूशन देते हैं. यही नहीं बाकायदा उनका नाम भी सरकारी स्कूल में रजिस्टर्ड कराते हैं, जिससे वो विधिवत रूप से पढ़ सकें और भविष्य में अपना जीवन संवार सकें. बीती 2 सितम्बर की शाम को आम दिनों की तरह नरेश कुमार बच्चों को पढ़ा रहे थे. पिछले 2 महीने से नरेश कुमार के पास यह बच्चे पढ़ने के लिए आते थे. इस दौरान तीन छोटे बच्चे उनके पास आए और उनको ऐसी बात कही की नरेश कुमार की आंखों में भी आंसू आ गए. छोटी बच्ची लक्ष्मी ने उनके कान में बताया कि सर आज हमारा आखिरी दिन है. हम वापस गांव जा रहे हैं, पर हम पढ़ना चाहते हैं. प्लीज आप मेरे मम्मी-पापा को समझा दो कि वह हमें गांव ना लेकर जाएं.


बच्चों की बात सुनकर भर आई आखें
जब नरेश कुमार ने उनसे इसकी वजह जानी तो बताया कि पिता की तबीयत खराब रहती है, उनको मजदूरी नहीं मिलती. इसलिए गुजारा नहीं हो पाता, इसलिए गांव वापस जा रहे हैं. नरेश कुमार की भी आंखें भर आईं और उन्होंने बच्चों को कहा कि तुम घर जाओ, मैं आकर तुम्हारे माता -पिता से बात करूंगा. शाम 7 बजे के आसपास जब नरेश कुमार बच्चों के घर गए तो देखा कि उनके मां-बाप ने पूरा सामान बांध रखा था. और वो जाने की तैयारी कर रहे थे. उन्होंने उनकी परेशानी सुनी तो पता चला कि पति-पत्नी दोनों काम करना चाहते हैं, लेकिन काम नहीं मिलता.

मजबूर हो माता-पिता जा रहे थे गांव
इसलिए सिर्फ मजबूरी में वापस जा रहे हैं. नरेश कुमार की भी इतनी हैसियत नहीं है कि वह उनकी मदद कर सकें. लेकिन उन्हें आश्वासन दिया कि वह अपने दोस्तों से बात करेंगे और आप लोगों को काम दिलाने की कोशिश करेंगे, कुछ दिन रुक जाओ. अगर काम नहीं मिलता है तो आप बेशक चले जाना. लेकिन यह बच्चे पढ़ना चाहते हैं, इनकी पढ़ाई बंद मत करवाओ. नरेश ने जब आश्वासन दिया तो दोनों पति-पत्नी के दिमाग में भी बात आई और उन्होंने कहा कि वह मजदूरी कर लेंगे, अगर उन्हें काम मिल जाता है तो वो भी चाहते हैं कि उनके बच्चे पढ़ें. 

मैं खुश हूं कि पढ़ पाउंगी-लक्ष्मी
छोटी बच्ची लक्ष्मी ने बताया कि जब मम्मी-पापा ने तैयारी कर ली थी तो उसने सोचा कि अब तो नहीं पढ़ पाएंगे तो उम्मीद लेकर सर के पास आई थी. मम्मी-पापा मास्टरजी की बात मान गए. अब मुझे बहुत खुशी है कि मैं पढ़ पाऊंगी और बड़ी होकर डॉक्टर बनूंगी. तीनों बच्चों की मां अनीता का कहना है कि उन्हें बहुत दूर काम मिला है और वहां आने-जाने में ही एक-एक घंटा लग जाता है. तीन कोठियां में सुबह से लेकर शाम तक काम करती हैं. उसी में पूरा दिन निकल जाता है. पति की तबीयत खराब रहती है और उनको काम भी नहीं मिलता. ठेकेदार भी पैसे नहीं दे रहा, इसलिए मजबूरी में घर जाने का फैसला किया था. अब कुछ उम्मीद जगी है कि उन्हें काम भी मिलेगा और उनके बच्चे भी पढ़ पाएंगे तो खुशी हो रही है.

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