Mainpuri Upchunav: कांशीराम को संसद पहुंचाने वाली जसवंतनगर विधानसभा डिंपल यादव को देगी ‘ऑक्सीजन’!

हाइलाइट्स

कांशीराम पहिल दफा इटावा से जीतकर लोसभा पहुंचे थे
कांशीराम की जीत में जसवंतनगर सीट का खासा योगदान था
अब मुलायम सिंह की बहू डिंपल मैदान में हैं तो एक बार फिर सपा की उम्मीद यहीं से है

इटावा. करीब तीन दशक पहले बसपा सुप्रीमो कांशीराम उत्तर प्रदेश की इटावा संसदीय सीट से पहली दफा संसद पहुंचे थे. ऐसा कहा जाता है कि कांशीराम की जीत में सबसे बड़ा योगदान इटावा संसदीय सीट की जसवंतनगर विधानसभा का रहा. अब जब नेताजी मुलायम सिंह यादव के निधन के बाद मैनपुरी संसदीय सीट का उपचुनाव हो रहा है तो फिर चर्चा शुरू हो चुकी कि क्या कांशीराम की तरह जसवंतनगर विधानसभा बहू डिंपल यादव को ‘आक्सीजन’ देगी?

1991 में हुए इटावा लोकसभा के उपचुनाव में बसपा प्रत्याशी कांशीराम को पहली दफा जीत हासिल हुई थी. इटावा मे जबरदस्त हिंसा के बाद चुनाव रद्द कर दिया गया था. तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने हिंसा के बाद दुबारा चुनाव कराने का आदेश दिया, जिसमें बसपा सुप्रीमा कांशीराम चुनाव मैदान मे इटावा लोकसभा सीट उतरे थे. इस सीट से कांशीराम समेत कुल 48 प्रत्याशी मैदान में थे. चुनाव में कांशीराम को एक लाख 44 हजार 290 मत मिले और उनके समकक्ष बीजेपी प्रत्याशी लाल सिंह वर्मा को 1 लाख 21 हजार 824 मत मिले थे. जबकि मुलायम सिंह यादव की जनता पार्टी से लड़े राम सिंह शाक्य को मात्र 82624 वोट ही मिले थे.

जसवंतनगर सीट की वजह से कांशीराम पहुंचे संसद

दरअसल, कहा जाता है कि विधानसभा चुनाव में कांशीराम ने इटावा की जसवंतनगर सीट से मुलायम सिंह यादव के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं उतारा था. जिसके बदले लोकसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव ने जसवंतनगर विधानसभा में जनता पार्टी के उम्मीदवार राम सिंह शाक्य के बजाय बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार कांशीराम के पक्ष में मतदान करने की लोगों से अपील कर दी. नतीजा यह निकला कि कांशीराम पहली दफा जसवंतनगर के जरिए संसद का रास्ता तय कर पाए. कांशीराम की इस जीत के बाद उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का गठन हुआ और बसपा का गठजोड़ के बाद चुनाव लड़ा गया.

सपा का गढ़ है जसवंतनगर सीट

राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि जसवंतनगर विधानसभा समाजवादी पार्टी के प्रभाव में रहती है, इसलिए यहां के मतदाता समाजवादियों के इशारे पर मतदान करते हैं. मैनपुरी लोकसभा सीट पर उपचुनाव इस बार प्रतिष्ठा की लड़ाई है. एक तरफ मुलायम का परिवार अपने राजनीतिक विरासत को बचाने के लिए मैदान में है, तो दूसरी तरफ बीजेपी इस गढ़ पर कब्ज़ा करने की कवायद में जुटी है. दोनों की ही रणनीति के केंद्र में जसवंतनगर विधानसभा क्षेत्र है. यादव मतों की बहुलता वाले इस क्षेत्र से सपा को हर बार निर्णायक बढ़त मिली है और अब तो अखिलेश यादव ने अपने चाचा शिवपाल यादव को भी मना लिया है. दूसरी तरफ बीजेपी भी इस क्षेत्र में बढ़त के लिए वहां के स्थानीय प्रत्याशी रघुराज सिंह शाक्य को मैदान में लाई है. क्योंकि मैनपुरी लोकसभा सीट पर जीत की डगर, जसवंतनगर से ही निकलती है.

इसलिए भी अहम्व है जसवंतनगर 

2014 के लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त मोदी लहर चली थी. सूबे में बीजेपी को बड़ी जीत मिली थी. लेकिन मैनपुरी लोकसभा सीट पर मुलायम सिंह यादव ने बीजेपी प्रत्याशी शत्रुघ्न सिंह चौहान को पराजित किया था. बीजेपी की यह कोई मामूली अंतर की हार नहीं थी. हार का अंतर 3 लाख 66 हजार वोट था. इसमें भी अकेले जसवंतनगर क्षेत्र से मुलायम सिंह ने 1 लाख 60 हजार मतों की बढ़त हासिल की थी. हालांकि उस समय बीजेपी का संगठन भी इस लोकसभा क्षेत्र में कमजोर था. बीजेपी का विस्तार होना शुरू हुआ और वर्ष 2017 में प्रदेश में सरकार बनने के बाद इसमें तेजी आई.

बीजेपी ने जसवंतनगर में बनाई पैठ

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के मत प्रतिशत में बड़ी बढ़ोतरी हुई. 2014 के चुनाव में बीजेपी को 23.14 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि 2019 में 44.01 प्रतिशत वोट मिले। इतनी बढ़त के बाद भी बीजेपी  पर मुलायम सिंह यादव ने 94 हजार मतों की बढ़त बनाई थी. मुलायम इस बढ़त में 62 हजार वोटों की बढ़त केवल जसवंतनगर क्षेत्र से मिली थी. बीजेपी बीते चुनाव के बाद से ही जसवंतनगर में संगठन को मजबूत करने में जुटी है. पूर्व में सभी बूथों पर समितियां नहीं थी. अब सभी बूथों पर बीजेपी ने समितियों का गठन कर लिया है. जसवंतनगर की पहेली को सुलझाने के लिए ही पूर्व सांसद रघुराज सिंह शाक्य को प्रत्याशी बनाया है. रघुराज सिंह शाक्य खुद जसवंतनगर के रहने वाले और वहां उनकी पकड़ भी मानी जाती है. बीजेपी  की पहली कोशिश जसवंतनगर में सपा की बढ़त को कम कर, खुद आगे बढ़ने की है. दूसरी तरफ सपा भी बीते चुनाव में वोटों के कम अंतर को लेकर चिंतित है. ऐसे में सबसे पहला फोकस जसवंतनगर पर ही किया जा रहा है.

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