Jabalpur News: वाह री रानी दुर्गावती यूनिवर्सिटी, अफसर को रिटायर्ड करना ही भूल गया प्रबंधन !

एक से बढ़कर एक कारनामों की यूनिवर्सिटी

एक से बढ़कर एक कारनामों की यूनिवर्सिटी

कभी दुर्गावती के बलिदान दिवस पर रानी लक्ष्मीबाई लिखकर आदेश जारी करना, तो कभी परीक्षा कॉपी में लिखे चुटकुलों पर नंबर देना..ऐसे कई कारनामों के बाबजूद जबलपुर का रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय प्रबंधन सुधरा नहीं। अब अधिकारी के रिटायर्मेंट को लेकर सामने आई बड़ी लापरवाही ने तो सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए। इसे क्या कहा जाएगा जब यूनिवर्सिटी जैसा प्रशासन अपने अधिकारी को रिटायर करना ही भूल जाए।

प्रभारी डॉयरेक्टर डॉ. राजेश्वरी राणा का था रिटायर्मेंट

प्रभारी डॉयरेक्टर डॉ. राजेश्वरी राणा का था रिटायर्मेंट

यूनिवर्सिटी में UGC द्वारा ह्यूमन रिसोर्स डेवलपमेंट सेंटर स्थापित है। पहले यह एकेडमिक स्टॉफ कॉलेज (ASC)के नाम से जाना जाता था। इसमें नियुक्त प्रभारी डायरेक्टर डॉ. राजेश्वरी राणा को उम्र के हिसाब से नियम मुताबिक अगस्त में रिटायर हो जाना था। नवंबर आ गया लेकिन इस बात का ख्याल न तो विश्वविद्यालय प्रबंधन को आया और न ही सेवानिवृत होने वाली प्रभारी डायरेक्टर को। दूसरे स्टाफ में जब राणा के उम्र की चर्चा शुरू हुई तो इस बड़ी लापरवाही की पोल खुली।

कुलसचिव बोले मामले की कराई जा रही जांच

कुलसचिव बोले मामले की कराई जा रही जांच

यह मामला उजागर होने के बाद विश्वविद्यालय में हड़कंप मचा हुआ है। जिम्मेदार अधिकारी कर्मचारी अब एक दूसरे की बगले झांक रहे है। कुछ तो लापरवाही के ऐसे कारण ढूंढने में लग गए है, जिससे उनकी नौकरी पर किसी तरह का संकट न आए। जब बबाल मचा तो मामले की एक नोटशीट कुलसचिव के पास पहुंची है। रजिस्ट्रार ब्रजेश सिंह का कहना है कि इस पूरे मामले का परीक्षण कराया जा रहा है।

6 महीने पहले नोटिस भेजने का है नियम

6 महीने पहले नोटिस भेजने का है नियम

डॉ. राजेश्वरी राणा जो की सेवानिवृत्त अगस्त माह में हो जानी चाहिए थी। यूनिवर्सिटी के स्थापना विभाग में मौजूद सर्विस बुक के हिसाब से अगस्त में 62 वर्ष की उम्र को पूरी कर रही थी। नियमनुसार जो भी अधिकारी या कर्मचारी सेवानिवृत्त होने वाला रहता है, उसे स्थापना विभाग 6 माह पूर्व नोटिस भेजता है। ताकि वह सर्विस बुक से जुड़े तमाम आवश्यक दस्तावेजों को अपडेट करवा ले और पेंशन या अन्य भुगतान पाने में कोई समस्या उत्पन्न न हो। लेकिन डॉ. राजेश्वरी राणा के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। चौकाने वाली बात यह भी है कि अगस्त के दो महीने बाद भी स्थापना विभाग को होश नहीं आया।

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