Gyan Ganga: विभीषण जब सुग्रीव से पहली बार मिले तो दोनों ने क्या बात की?

संसार में आप भी किसी का परिचय दें, तो यही तो कहा जाता है, कि फलां कुमार ‘पुत्र’ श्री फलां कुमार। यह थोड़ी न कहा जाता है, कि फलां कुमार ‘भाई’ श्री फलां कुमार। लेकिन सुग्रीव ने, श्रीविभीषण जी का ऐसा ही उल्टा-सा परिचय दिया।

श्रीविभीषण जी सागर के उस पार, वहाँ आन पहुँचे थे, जहाँ पर शरण लेने के लिए, बड़े-बड़े ऋर्षि मुनि भी जन्मों-जन्मों प्रार्थनायें करते हैं। सांसारिक दृष्टिकोण से देखा जाये तो श्रीविभीषण जी का त्याग कोई साधारण स्तर का नहीं था। बात केवल त्याग की भी नहीं है। उनके साहस की भी यहाँ, जितनी प्रशंसा हो सके, उतनी ही कम है।

जैसा कि हमने विगत अंक में भी कहा था, कि श्रीविभीषण जी, प्रभु श्रीराम जी के, पावन श्रीचरणों को लेकर अनेकों सुंदर कल्पनायें किए जा रहे थे। प्रभु के युगल श्रीचरणों के प्रति उनके मन में अनेकों सुंदर भाव थे। जिन्हें वे अपने हृदय रूपी पोटली में संभाले बैठे थे।

वानरों ने जब देखा कि रावण की लंका से कोई दूत आया है, तो श्रीविभीषण जी को पहरे में बिठा कर, वे उसी क्षण सुग्रीव को जाकर सूचना देते हैं, कि लंका से, रावण के भाई विभीषण जी आये हैं। यह सुना तो सुग्रीव तत्काल प्रभाव से, श्रीराम जी के सान्निध्य में उपस्थित होते हैं। सुग्रीव प्रभु से सारा वाक्य कह सुनाते हैं। भगवान श्रीराम जी तो पूर्ण सहज भाव में ही हैं। लेकिन सुग्रीव कुछ अधिक ही सजगता की मुद्रा में दिखाई प्रतीत हो रहे हैं। सुग्रीव का ऐसे भाव में आना उचित भी प्रतीत होता है। कारण कि विगत काल में, श्रीराम जी की ओर से तो एक दूत, श्रीहनुमान जी के रूप में लंका गया था। लेकिन लंका की ओर से, एक भी दूत प्रभु के पास नहीं आया था। यह देख सुग्रीव का माथा ठनक गया। सुग्रीव रावण के चरित्र को लेकर इतना सशंकित व असहजता से भरा था, कि मन मानने को तैयार ही नहीं था, कि रावण कोई सीधा सच्चा आचरण भी कर सकता है। उसका मानना था, कि रावण बिना कपट व छल के तो श्वाँस तक भी नहीं लेता। अपने भाई को उसने यहाँ भेजा है, तो अवश्य ही उसकी कोई कपट योजना ही होगी। इसलिए उसने प्रभु श्रीराम जी को, श्रीविभीषण जी का परिचय ही इस प्रकार से दिया, कि श्रीविभीषण जी के प्रति, श्रीराम जी का हृदय भी, ऐसे ही भावों से भर जाये-

‘कह सुग्रीव सुनहु रघुराई।

आवा मिलिन दसानन भाई।।’

सुग्रीव ने श्रीविभीषण जी का परिचय, श्रीविभीषण जी के पिता जी के आधार पर न देकर, दुष्ट रावण के भाई के रूप में दिया।

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संसार में आप भी किसी का परिचय दें, तो यही तो कहा जाता है, कि फलां कुमार ‘पुत्र’ श्री फलां कुमार। यह थोड़ी न कहा जाता है, कि फलां कुमार ‘भाई’ श्री फलां कुमार। लेकिन सुग्रीव ने, श्रीविभीषण जी का ऐसा ही उल्टा-सा परिचय दिया। कि रावण का भाई आया है। सुग्रीव यह भी तो कह सकता था, कि विर्श्वा मुनि का पुत्र आया है। लेकिन नहीं, सुग्रीव विशेष बल देकर कहते हैं, कि रावण का भाई आया है। सुग्रीव का मनोभाव यही कहता है, कि रावण का भाई कहने से, श्रीविभीषण जी का चरित्र पर भी, रावण के चरित्र के समान ही, धुँधला ही चित्रित होगा। वहीं अगर यह बोला जाता, कि महान तपस्वी व ऋर्षि, श्रीविर्श्वा मुनि का पुत्र आया है, तो श्रीविभीषण जी का चरित्र, सहज ही महान-सा दिखाई देता। लेकिन सुग्रीव के मन में रावण को लेकर इतनी खटास है कि वह लंका की ओर से आने वाली सुंदर सुगंध को भी, दुर्गंध की ही संज्ञा देता है। सुग्रीव का सोचना था, कि मेरे भाई बालि ने, भले ही मेरे प्रति बैर रखा हो, लेनिक संसार के सारे भाई ऐसे थोड़ी न होते हैं। यह विभीषण अवश्य ही रावण का भाई होने के नाते, उसके प्रति समर्पित होगा ही होगा।

सुग्रीव द्वारा, प्रभु श्रीराम जी को यह भी बताया गया, कि विभीषण रावण का त्याग करके, प्रभु श्रीराम जी की ही शरण लेने आया है। प्रभु श्रीराम जी ने जब यह सुना, तो उनके हृदय में क्या चल रहा है, यह हम अभी कुछ ही देर के पश्चात जान सकेंगे। लेकिन इससे पूर्व, सुग्रीव के मन में क्या चल रहा है, प्रभु श्रीराम यह जानना चाहते थे। सुग्रीव को संबोधित करते हुए, प्रभु श्रीराम जी कहते हैं-

‘कह प्रभु सखा बूझिए काहा।

कहइ कपीस सुनहु नरनाहा।।’

प्रभु श्रीराम को सुग्रीव क्या उत्तर देता है, व क्या सुग्रीव, श्रीराम जी की आशा के अनुरूप ऊत्तर देते हैं? जानेंगे अगले अंक में—जय श्रीराम।

-सुखी भारती

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