2 अफेयर,1 शादी फिर भी अकेले थे देव आनंद: अंग्रेजों के खत पढ़ने की नौकरी की, इंदिरा गांधी के खिलाफ बनाई थी पार्टी

23 मिनट पहलेलेखक: अरुणिमा शुक्ला

आज सदाबहार एक्टर देव आनंद की 12वीं पुण्यतिथि है। हिंदी सिनेमा के इतिहास में देव आनंद पहले एक्टर थे, जिनकी लड़कियों में सबसे ज्यादा फैन फॉलोइंग थी। देव आनंद अपनी फिल्मों के साथ ही जीने के अंदाज के लिए भी जाने जाते थे। कम ही लोग जानते हैं कि फिल्मों में आने से पहले देव आनंद ब्रिटिश सरकार के मुलाजिम हुआ करते थे।

फिल्म स्टार बनने की चाह में अंग्रेजों की नौकरी छोड़ी और सिनेमा का स्ट्रगल शुरू किया। अपने दौर की सबसे खूबसूरत एक्ट्रेस सुरैया से अफेयर था। ये प्यार इतना गहरा था कि जब घर वाले इनके रिश्ते के खिलाफ हुए तो सुरैया ने ताउम्र शादी नहीं की। हालांकि देव आनंद ने अपनी को-एक्ट्रेस कल्पना कार्तिक से शादी की थी। वो भी फिल्म के सेट पर ही। फिर अलगाव भी हुआ।

जीनत अमान से भी देव आनंद का नाम जुड़ा। इतनी खूबसूरत अभिनेत्रियां जिंदगी में आईं, लेकिन देव साहब अकेले ही रहे। एक के बाद एक हिट फिल्मों ने इन्हें सुपरस्टार और सदाबहार सितारे का तमगा भी दिलाया। देव आनंद की कहानी अपने आप में सिनेमाई है। कई किस्से और बातें ऐसी हैं जो लोग कम ही जानते हैं।

आज देव साहब की पुण्यतिथि पर पढ़िए उनकी लव लाइफ से लेकर फिल्मी जिंदगी तक के कुछ अनसुने किस्से…

फिल्में देखते और फिल्मी मैगजीन पढ़ते हुए बीता बचपन

कहानी के पहले चैप्टर में नजर डालते हैं देव आनंद के बचपन पर। देव आनंद का जन्म 26 सितंबर 1923 को पंजाब के गुरदासपुर में हुआ था। उनके पिता पिशोरी लाल आनंद गुरदासपुर जिले के नामी वकील थे। इनके मां-बाप के कुल नौ बच्चे हुए जिनमें वे पांचवी संतान थे।

देव आनंद को बचपन से ही फिल्में देखना और फिल्मी पत्रिकाएं पढ़ने का बहुत शौक था। वो रद्दी की दुकान से पत्रिका लाकर पढ़ा करते थे। रोज पत्रिका खरीद कर लाने से दुकानदार से भी उनकी दोस्ती हो गई थी, इस वजह से दुकानदार रोज देव आनंद के लिए पत्रिका छांटकर अलग से रख देता और कभी-कभी मुफ्त में भी दे देता था।

इसी दौरान उस पत्रिका वाले की दुकान पर देव आनंद ने एक दिन सुना कि अपनी फिल्म बंधन के लिए अशोक कुमार गुरदासपुर आ रहे हैं। जब अशोक कुमार आए तो उन्हें देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ पड़ी। जहां एक तरफ लोग अशोक कुमार से मिलने और उनसे ऑटोग्राफ लेने के लिए उतावले थे, वहीं दूसरी तरफ देव आनंद दूर खड़े होकर उन्हें बस देख रहे थे।

आर्थिक तंगी की वजह से विदेश ना जा सके, इंडियन नेवी से भी रिजेक्ट हुए

देव आनंद के कॉलेज के अधिकतर छात्र आगे की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जा रहे थे। उनका भी मन विदेश जाकर पढ़ाई करने का था, लेकिन घर की माली हालत ठीक नहीं थी इसलिए पिताजी उन्हें विदेश पढ़ाई के लिए नहीं भेज सके, क्योंकि उनके ऊपर और बच्चों की भी जिम्मेदारी थी।

उसी दौरान देव आनंद को इंडियन नेवी की नौकरी से भी रिजेक्ट कर दिया गया। इस बात से वो पूरी तरह टूट गए थे। इसके बाद उन्होंने बैंक में क्लर्क की नौकरी कर ली, लेकिन उनका सपना तो कुछ और ही था और उन्होंने मुंबई का रुख कर लिया।

खुद का पेट पालने के लिए स्टाम्प कलेक्शन के एल्बम को बेचा

जेब में 30 रुपए और आंखों में एक एक्टर बनने का सपना लेकर देव आनंद सपनों की नगरी मुंबई आ गए। भरी दोपहरी फिल्म स्टूडियो के चक्कर लगाने में बीत जाया करते थे। समय गुजर रहा था, लेकिन काम मिलने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही थी, जिसकी वजह से देव आनंद खुद की नाकामयाबी से हताश हो रहे थे।

काम की इसी जद्दोजहद के दौरान उनके 30 रुपए भी खत्म हो गए। भूख लगी और जब खाने के लिए जेब में हाथ डाला तो एक भी रुपए नहीं मिले। भूख और काम की इसी लालसा में उन्होंने स्टाम्प कलेक्शन के एल्बम को बेच दिया जो उन्होंने बरसों से इकट्ठा किया था। इस एल्बम से उन्हें 30 रुपए मिले थे, जिससे उन्होंने मुंबई में कुछ और दिनों तक गुजारा किया।

गुजारे के लिए चिट्ठियां पढ़ने की नौकरी की

देव आनंद ने काम के सिलसिले में कई लोगों के दरवाजे खटखटाए, लेकिन निराशा ही हाथ लगी। सपनों की नगरी में खुद के सपनों से दूर जाता देख उन्होंने 85 रुपए मासिक वेतन के साथ एक जगह क्लर्क की नौकरी कर ली। कुछ टाइम बाद नौकरी रास नहीं आई तो उसे भी छोड़ दिया। वजह ये भी थी कि उनका हाथ गणित में तंग था।

इसके बाद उन्होंने ब्रिटिश आर्मी के सेंसर ऑफिस में काम किया। वहां उनका काम सेना के अधिकारियों के लिखे लेटर्स को पोस्ट करने से पहले पढ़ने का था। ब्रिटिश सरकार अपने अधिकारियों के खतों को भी सेंसर करती थी, ताकि कोई गोपनीय सूचना बाहर ना जा सके। हालांकि ज्यादातर चिट्ठियां वो ही होती थीं जो सेना के जवान अपनी पत्नी या प्रेमिकाओं को लिखा करते थे। इस काम में उनका मन रम गया था, क्योंकि उन खतों को पढ़ना उन्हें बहुत अच्छा लगता था।

एक खत ने बदल दी जिंदगी

सेंसर ऑफिस में काम करने के लिए देव आनंद को 165 रुपए मिलते थे, जो उनकी सभी जरूरतों के लिहाज से ज्यादा ही थे, लेकिन धीरे-धीरे उनको लग रहा था कि वो अपने सपनों से पीछे जा रहे हैं। देव आनंद बनना तो चाहते थे फिल्म स्टार, लेकिन एक सरकारी बाबू बनकर रह गए थे।

वो उस नौकरी को छोड़कर आगे बढ़ना चाहते थे, लेकिन कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था। इसी उलझन के दौरान उनके हाथ एक ऑफिसर का लिखा खत लगा जिसने देव आनंद को आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया। उस खत में ऑफिसर ने अपने पत्नी को लिखा था- ‘काश, मैं अभी ये नौकरी छोड़ सकता तो सीधे तुम्हारे पास आता और तुम्हारी बाहों में होता।’

इस खत की एक लाइन काश, मैं अभी ये नौकरी छोड़ सकता ने देव आनंद को नए हौसलों और नई ऊर्जा से भर दिया और उन्होंने ये नौकरी छोड़ दी और निकल पड़े अपने सपनों को पूरा करने के लिए।

पहली फिल्म मिलने का किस्सा

आराम की नौकरी छोड़कर एक बार वो फिर अपने फिल्म स्टार बनने के सपने को पूरा करने की राह पर चल दिए। उसी दौरान लोकल ट्रेन में एक मुसाफिर ने बताया कि ‘प्रभात फिल्म कंपनी’ अपनी आने वाली फिल्म के लिए एक सुंदर नौजवान की तलाश कर रही है।

अगले दिन देव आनंद पहुंच गए फिल्म कंपनी जहां उनकी मुलाकात कंपनी के मालिक बाबूराव पाई से हुई। बाबूराव पाई उनकी बातों और उनके बेबाक जवाब से बहुत प्रभावित हुए और कहा कि कल आकर पी.एल.संतोषी से मिल लेना।

फिर अगले दिन उनकी मुलाकात पी.एल संतोषी से हुई। उनको भी उन्होंने अपनी बातों और पर्सनैलिटी से इतना इम्प्रेस किया कि उन्होंने देव आनंद को 3 साल के कॉन्ट्रैक्ट के साथ प्रभात फिल्म कंपनी का हिस्सा बना लिया।

इस बैनर तले उनकी पहली फिल्म थी हम एक हैं, लेकिन ये फिल्म कुछ खास कमाल नहीं दिखा पाई थी। हालांकि यहीं से उनका फिल्मी सफर शुरू हो गया था। उन्हें इस दौरान कई और फिल्मों के ऑफर भी मिलने लगे।

‘जिद’ से मिली पहचान

इसके बाद देश के विभाजन के उथल-पुथल के दौरान ही देव आनंद का प्रभात कंपनी के साथ कॉन्ट्रैक्ट भी खत्म हो गया। हालांकि उनका ये संघर्ष लंबा नहीं चला और देव आनंद को अशोक कुमार की फिल्म जिद में काम मिल गया। ये वही फिल्म थी जिसने उन्हें बतौर एक्टर फिल्म इंडस्ट्री में स्थापित किया था।

पहले प्यार की अधूरी कहानी

1948 की फिल्म विद्या में देव आनंद को उस दौर की एक्ट्रेस और सिंगर सुरैया के साथ काम करने का मौका मिला। उन दिनों सुरैया कामयाबी के शिखर पर थीं और देव आनंद इंडस्ट्री में नए थे। इसी फिल्म की शूटिंग के पहले दिन दोनों की मुलाकात हुई।

किस्सा पहले दिन की मुलाकात का-

सुरैया को फिल्म डायरेक्टर ने देव आनंद से मिलवाया और कहा कि ये है हमारी फिल्म का नया हीरो। कोई और आगे की जानकारी देता उससे पहले देव आनंद ने खुद से ही खुद का परिचय दे दिया।

देव आनंद- यहां सभी लोग मुझे देव कहकर पुकारते हैं। आप क्या कहेंगीं?

सुरैया- देव

देव आनंद एकटक सुरैया को देख रहे थे।

सुरैया- तुम क्या देख रहे हो।

देव आनंद- आप में कुछ है।

सुरैया- मुझमें क्या है?

देव आनंद- बाद में बताऊंगा।

इस छोटी सी बातचीत के बाद दोनों फिल्म की शूटिंग में बिजी हो गए, लेकिन उनकी ये छोटी सी बात एक गहरे रिश्ते की शुरुआत थी। फिल्म की शूटिंग के दौरान ही देव आनंद और सुरैया एक-दूसरे को पसंद करने लगे थे। सेट पर दोनों को एक-दूसरे की तलाश रहती थी। दोनों ने एक दूसरे का नाम भी रख दिया था। देव आनंद सुरैया को नोजी बुलाते थे और सुरैया उनको स्टीव।

दोनों का ये खूबसूरत रिश्ता परवान चढ़ा ही था कि ये बात सुरैया की नानी को पता चल गई और उसके बाद इस रिश्ते का अंजाम कुछ यूं रहा-

सुरैया अपनी मां, मामा और नानी के साथ रहती थीं। शुरुआत में देव आनंद उनके घर डिनर पर जाते थे, लेकिन जब नानी को दोनों के रिश्ते की भनक लगी तो उन्होंने देव आनंद के आने पर पाबंदी लगा दी। नानी को ये बिल्कुल भी मंजूर नहीं था कि सुरैया की शादी किसी और धर्म के लड़के से हो। इसी वजह से वो इस रिश्ते के सख्त खिलाफ थीं। 1950 में देव आनंद और सुरैया ने साथ में दो और फिल्में सनम और जीत साइन की, लेकिन दोनों ही फिल्म की शूटिंग के दौरान सुरैया की नानी उनके साथ फिल्म सेट पर मौजूद रहती थीं। साथ ही दोनों के रोमांटिक सीन्स को भी डायरेक्टर से हटाने के लिए कहती थीं।

दोनों के बात करने पर भी नानी ने रोक लगा दी थी, इसलिए दोनों खत के जरिए बात किया करते थे, लेकिन खत का ये सिलसिला भी फिल्म की शूटिंग के बाद खत्म हो गया। दोनों ने शादी का फैसला किया, लेकिन नानी की वजह से वो भी मुक्कमल नहीं हो पाया और दोनों हमेशा के लिए अलग हो गए। इसकी वजह ये थी कि सुरैया कभी भी अपने परिवार के खिलाफ जाने का हौसला नहीं जुटा पाईं और उन्होंने ताउम्र बिना शादी के जीवन बिताया।

फिल्म सेट पर की एक्ट्रेस से शादी

सुरैया से अलगाव के बाद देव आनंद बिल्कुल अकेले रह गए। इसी दौरान उनकी मुलाकात कल्पना कार्तिक से हुई। कल्पना को उनके भाई चेतन आनंद ने फिल्म बाजी में काम करने के लिए कास्ट किया था। फिल्म सेट के अलावा भी देव आनंद और कल्पना मिलने लगे थे। दोनों को एक-दूसरे का साथ अच्छा लग रहा था।

बाजी की सफलता के बाद दोनों ने फिल्म टैक्सी ड्राइवर में भी एक साथ काम किया। पहली फिल्म में काम के लिए कल्पना को बहुत तारीफें मिलीं, जिसके बाद उन्हें देव आनंद की प्रोडक्शन कंपनी के अलावा अन्य बैनर से भी ऑफर मिलने लगे थे, लेकिन इन सभी ऑफर्स को कल्पना ने मना कर दिया था। उनका कहना था कि वो सिर्फ देव साहब के साथ ही फिल्में करना चाहती थीं।

देव आनंद को कल्पना का ये अंदाज बेहद पसंद आया जिसके बाद दोनों ने शादी कर ली। इनकी शादी का भी किस्सा मजेदार है।

किस्सा फिल्म टैक्सी ड्राइवर के सेट से है। इस फिल्म की शूटिंग के दौरान देव आनंद ने कल्पना से कहा कि वो उनके साथ शादी करना चाहते हैं। कल्पना पहले से ही इस पल का इंतजार कर रही थी और उन्होंने इसके लिए तुरंत हां कह दिया। इसके बाद दोनों ने फिल्म शूटिंग के ब्रेक के दौरान ही फिल्म सेट पर शादी कर ली।

दोनों दो बच्चों के माता-पिता बने। हालांकि शादी के कुछ सालों बाद ही दोनों का पारिवारिक जीवन कोई खास अच्छा नहीं रहा जिसके बाद दोनों अलग-अलग रहने लगे।

किस्सा जीनत अमान का फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा से जुड़ने का

देव आनंद फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा में बहन के किरदार के लिए एक एक्ट्रेस की तलाश में थे। कई एक्ट्रेसेस को उन्होंने इस रोल के लिए अप्रोच भी किया, लेकिन सभी ने ये कहकर मना कर दिया कि फिल्म में कोई उनकी बहन का रोल नहीं करना चाहता है। इसी दौरान एक पार्टी में उनकी नजर जीनत अमान पर पड़ी। उनके हाव-भाव बिल्कुल वैसे ही थे, जैसा देव आनंद को अपनी फिल्म के रोल के लिए चाहिए था।

देव आनंद ने उन्हें इस रोल के लिए अप्रोच किया और जीनत मान भी गईं। साथ ही वो स्क्रीन टेस्ट में भी पास हो गईं। इस फिल्म की सफलता के बाद जीनत अमान की पाॅपुलैरिटी में चार चांद लग गए। इसके बाद दोनों फिल्म हीरा-पन्ना में एक साथ नजर आए।

जीनत अमान से जलन, प्यार और अलगाव

इस फिल्म की शूटिंग के दौरान ही दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने लगी थीं और दोनों के अफेयर के चर्चे भी जोरों पर थे। फिर कुछ समय बाद इन दोनों में भी अलगाव की खबरें आने लगीं।

किस्सा दम मारो दम गाने से जुड़ा हुआ है। फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा के सिल्वर जुबली सेलिब्रेशन पर ऊषा उत्थुप स्टेज पर दम मारो दम गाना गा रही थीं। इस बीच कुछ लोग जीनत अमान को उठाकर स्टेज पर ले गए और उन्हें अपने कंधे पर बैठा लिया। देव आनंद को जीनत अमान पर गर्व था, लेकिन जीनत की सफलता से उनको जलन भी होने लगी। उनका मानना था कि जीनत को कामयाबी उन्हीं की बदौलत मिली है। हालांकि बाद में उन्हें ये एहसास हुआ कि उनकी ये सोच गलत है।

जीनत के साथ कुछ और वक्त बिताने के बाद उन्हें इस बात का एहसास हुआ कि वो जीनत अमान से प्यार करने लगे हैं। वो इस बात का इजहार जीनत के सामने करना चाहते थे, लेकिन उसी दौरान उनको ये पता चला कि जीनत अमान और राज कपूर के बीच नजदीकियां बढ़ रही हैं। इसके बाद उन्होंने अपने कदम पीछे खींच लिए।

इमरजेंसी के विरोध में पार्टी बनाई

1975 में इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगा रखी थी। उनके इस कदम का विरोध करने वालों में मुख्य नाम देव आनंद का भी था। यहां तक कि उन्होंने अपने समर्थकों के साथ रैली निकालकर इमरजेंसी का विरोध भी किया था। 1977 के आम चुनाव तक वो इंदिरा के खिलाफ ही रहे। उन्होंने ‘नेशनल पार्टी’ नाम से अपनी पार्टी भी बनाई जो आगे जाकर खत्म हो गई।

88 साल की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा

देव आनंद का 3 दिसंबर 2011 को दिल का दौरा पड़ने से 88 साल की उम्र में लंदन में निधन हो गया था। उनके निधन के 2 महीने बाद उनकी आखिरी फिल्म चार्जशीट रिलीज हुई, जिसे उन्होंने डायरेक्ट और प्रोड्यूस किया था।

नोट- इस स्टोरी से जुड़े सभी तथ्यों को देव आनंद की बायोग्राफी ‘सदाबहार आनंद; देव आनंद’ से लिया गया है।

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