आजादी के वक्त भारत में 550 से ज्यादा राजा, महाराजा, नवाब और निजाम थे. सब एक से बढ़कर एक रईस और अकूत संपत्ति के मालिक थे. जयपुर राजघराने की गिनती सबसे अमीर घरानों में हुआ करती थी. महाराजा जयपुर का खजाना राजस्थान की एक पहाड़ी के सीने में दफन था और कई पीढ़ियों के रणकुशल राजपूतों की एक विशेष टुकड़ी यहां पहरा देती आयी थी. हर महाराजा को अपने जीवन में केवल एक बार यहां जाकर अपने राज-पाट की शान-शौकत बढ़ाने के लिए अपनी पसंद के हीरे-जवाहरात चुन लाने का अवसर दिया जाता था.
तीन लड़ी वाला वो हार
चर्चित इतिहासकार डोमिनीक लापियर और लैरी कॉलिन्स अपनी किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में लिखते हैं कि जयपुर राजघराने के खजाने में तमाम बहुमूल्य चीजें थीं. सबसे चमत्कारिक एक तीन लड़ी का हार था, जिसमें पिरोया हुआ हर लाल हीरा कबूतर के अंडे के बराबर था और हर लड़ी में एक बहुत बड़ा पन्ना था, जिसमें से सबसे बड़ा 90 कैरेट का था.
कवच पहन नंगे निकलते थे महाराजा
पटियाला के सिख महाराजा के रत्न भंडार का सबसे अनमोल रत्न मोतियों का एक हार था, जिसका बीमा इंग्लैंड के मशहूर लॉयड्स बैंक ने दस लाख डॉलर का किया था. उनके पास एक अनोखी चीज़- हल्के आसमानी रंग के 1001 हीरों से जड़ा हुआ सीने पर पहनने का एक कवच था. परंपरा थी कि महाराजा साल में एक बार सीने पर केवल यह कवच बांधे बिलकुल नंगे अपनी प्रजा के सामने आते थे. जब महाराजा अपनी प्रजा के बीच से होकर गुजरते थे, तब सब लोग प्रसन्नता से तालियां बजाते.
लापियर और कॉलिन्स (Larry Collins and Dominique Lapierre) लिखते हैं कि ऐसी मान्यता थी कि महाराजा की नग्न मौजूदगी से एक शक्ति प्रसारित होती थी. ऐसा अंधविश्वास भी था कि उस दिन उनके राज्य से भूत-प्रेत और दुष्ट आत्माएं गायब हो जाती थीं.
महाराजा कपूरथला की वो पगड़ी
कपूरथला के सिख महाराजा (Maharaja Kapoorthala) की पगड़ी पर दुनिया का सबसे पुखराज किसी दानवी जंतु की आंख की तरह चमकता रहता था और उसकी खूबानी जैसी चमक के चारों ओर 3,000 अन्य हीरे-मोती दमकते रहते थे. उनकी पगड़ी इतनी शानदार थी कि दूर-दूर से लोग बस इसकी एक झलक पाने आया करते थे.
महाराजा बड़ौदा का 100 बूढ़ा हाथी
महाराजा बड़ौदा जिस हाथी पर बैठकर निकलते थे, उसकी सज-धज बहुत निराली होती थी. यह हाथी 100 साल का बूढ़ा जानवर था और अपने नुकीले दांतों से बीच लड़ाइयों में बीस दूसरे हाथियों को मौत की नींद सुला चुका था. उसका सारा साज-सामान सोने का बना हुआ था. वह हौदा जिस पर महाराजा बैठते थे, उसकी जीन और काठी, उसकी पीठ पर डाली जाने वाली झूल- हर चीज. इस हाथी के दोनों कानों में दस-दस सोने की जंजीरें लटकती रहती थीं. हर जंजीर उसकी एक विजय का प्रतीक थी और उनमें से हर एक का मूल्य 25,000 पौंड था.
हाथी हुआ करते थे रईसी का प्रतीक
लापियर और कॉलिन्स लिखते हैं कि हाथी कई पीढ़ियों से राजा-महाराजाओं की सबसे प्रिय सवारी रहा था. वह ब्रह्मांड की संपूर्ण व्यवस्था का प्रतीक माना जाता था. हिंदुओं के विश्वास के अनुसार उसका जन्म भगवान राम के हाथ से हुआ था और वह संपूर्ण सृष्टि, आकाश और बादलों का आधार स्तंभ था. साल में एक बार मैसूर के महाराजा अपने फीलखाने के सबसे बड़े हाथी के सामने साष्टांग दंडवत की मुद्रा में लेटकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते थे और इस प्रकार प्रकृति की शक्तियों के साथ अपने अटूट संबंध को पुनः जागृत करते थे. प्रत्येक राजा की हैसियत इस बात से आंकी जाती थी कि उसके फीलखाने में कितनी संख्या में, कितने पुराने और कितने बड़े हाथी हैं.
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FIRST PUBLISHED : February 11, 2024, 09:49 IST