हिमाचल प्रदेश में ‘RRR’: होम स्टेट में बीजेपी चीफ नड्डा को चुकानी पड़ी ‘रिवाज, राज और बागियों’ की कीमत

शिमला. गुजरात विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की शानदार जीत के बीच पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश में पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा. यह पार्टी प्रमुख जे पी नड्डा और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर का गृह राज्य भी है, जहां पार्टी ने ‘राज नहीं, रिवाज बदलेंगे’ का नारा दिया था. जबकि पार्टी को गुजरात में स्पष्ट बहुमत मिला, वह निर्दलीयों की मदद से हिमाचल में सरकार बनाने की उम्मीद कर रही थी और यह प्रक्रिया मतदान खत्म होने के तुरंत बाद शुरू हुई भी हो चुकी थी, और इसीलिए पार्टी ने राष्ट्रीय महासचिव विनोद तावड़े को बुधवार रात पहाड़ी राज्य भेजा था. हालांकि, कांग्रेस के स्पष्ट बहुमत हासिल करने के साथ ही भाजपा की सारी उम्मीदें धराशायी हो गईं.

सूत्रों ने कहा कि ऐसी अफवाहें हैं कि हार के लिए राज्य के शीर्ष नेताओं के बीच मतभेद जिम्मेदार हैं. सूत्रों ने बताया कि कुछ महीने पहले जब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बदले गए, तो हिमाचल के मुख्यमंत्री को भी बदलने की योजना थी. हालांकि, सूत्रों ने कहा कि पार्टी के शीर्ष नेताओं ने राज्य में वह बदलाव नहीं होने दिया.

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पिछले चुनावों में सत्ता विरोधी लहर को हराने के लिए, भाजपा ने विधानसभा चुनाव से ठीक एक साल पहले मुख्यमंत्रियों और कैबिनेट को भी बदल दिया था और जीत दर्ज की थी. चाहे वह उत्तराखंड हो, जहां पार्टी परंपरा बदलने में सफल रही हो, या फिर गुजरात, जहां पार्टी ने सीएम और कैबिनेट बदली हो. और फिर, कुछ ऐसे राज्य थे जहां भाजपा ने मौजूदा उम्मीदवारों या सीएम को नहीं बदलने का फैसला किया और हार गई. उदाहरण के लिए, झारखंड, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली.

दिल्ली में पिछले निकाय चुनावों में सत्ता विरोधी लहर को मात देने के लिए हर मौजूदा पार्षद को बदल दिया गया था, लेकिन इस बार यह रणनीति नहीं अपनाई गई और कई लोगों ने इसे आप की हार के कारण के रूप में देखा. पहाड़ी राज्य को खोने का गम पार्टी नेतृत्व में भी देखा जा रहा है. एक वरिष्ठ पार्टी नेता ने कहा, ‘हमने टिकट वितरण में गड़बड़ी की. बागियों ने उस परंपरा को बदलने के हमारे रिकॉर्ड की हवा निकाल दी है, जहां सत्ताधारी दल फिर सत्ता में नहीं आता है. अगर हमने टिकट बंटवारे को लेकर प्रयोग नहीं किया होता, तो हम निश्चित तौर पर राज्य जीत जाते.’

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करीब 13 सीटें ऐसी हैं जहां वरिष्ठ नेताओं का मानना ​​है कि अगर सही उम्मीदवार को टिकट दिया जाता तो पार्टी हार से बच सकती थी. हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में मिली हार 2024 के लोकसभा चुनाव में भी बीजेपी के लिए परेशानी की वजह होगी. नरेंद्र मोदी सरकार अपने तीसरे कार्यकाल को लक्ष्य में रखते हुए भाजपा 2019 में तीन सीटों की तुलना में 2024 में सभी लोकसभा क्षेत्रों में जीत के साथ अपने टैली में सुधार करने की उम्मीद कर रही थी, लेकिन यह संभव नहीं हो सका.

निर्वाचन आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, 68 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस ने 40 सीट पर जीत दर्ज की है. वहीं, भाजपा को 25 सीट मिली है. तीन सीट पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है. आम आदमी पार्टी (आप) के हिस्से में कोई सीट नहीं आई. उसने 67 सीट पर चुनाव लड़ा था. हिमाचल प्रदेश का 1985 से यह राजनीतिक इतिहास रहा है कि यहां की जनता ने किसी भी पार्टी को लगातार दो बार सत्ता की चाबी नहीं सौंपी है.

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