हजारीबाग में लाइलाज बीमारियों का इलाज करते हैं एक्यूप्रेशर एक्सपर्ट डॉ. असीम, फीस जो आप चाहें

रिपोर्ट : सुबोध कुमार गुप्ता

हजारीबाग. जिले के डॉ असीम कुमार सिन्हा एक्यूप्रेशर के माध्यम से इलाज करने के लिए झारखंड सहित दूसरे राज्यों में भी मशहूर हैं. वह शहर के कांग्रेस ऑफिस रोड स्थित क्लीनिक पर पिछले 20 सालों से लोगों की सेवा कर रहे हैं. खास बात यह है कि किसी भी तरह की फीस नहीं लेते हैं. मरीज या उनके परिजन अपनी इच्छा से जो दे देते हैं, डॉक्टर असीम खुशी-खुशी रख लेते हैं. इनके पास दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, बंगलुरु, बिहार पश्चिम बंगाल व छत्तीसगढ़ से भी यहां पहुंचते हैं.

डॉ. असीम अभी तक 5000 से अधिक लोगों की तकलीफों का निवारण कर चुके हैं. उनके पास ऐसे भी केस आए हैं कि बच्चा अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो पा रहा, क्योंकि उनके दिमाग का पूरा विकास नहीं हो पाया. डॉ. असीम ने ऐसे बच्चों का भी कामयाब इलाज एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति से किया है. ऐसे कई बच्चे अब सामान्य जिंदगी जी रहे हैं.

एक्यूप्रेशर चिकित्सा के लाभ

डॉ असीम कुमार सिन्हा कहते हैं कि अब के दौर में लोग फिजिकल वर्क से कम और मेंटल वर्क से अधिक थक रहे हैं. मेंटल वर्क के दौरान लोगों में तनाव अधिक होता है. मांसपेशियां सिकुड़ने लगती हैं. शरीर में जगह-जगह दर्द उभरने लगता हैं. क्योंकि उनका फिजिकल वर्क न के बराबर होता है. ऐसे मामलों में दिमागी एक्सरसाइज के अलावा एक्यूप्रेशर का इलाज सार्थक होता है.

सारा कमाल ब्लड सर्कुलेशन का

डॉ असीम कुमार ने कहा कि एक्यूप्रेशर की मशीन और पुराने जमाने की हस्तकला के माध्यम से शरीर में ब्लड सर्कुलेशन कराया जाता है. जिससे सभी तरह के दर्द से निजात मिलता है. खासकर वैसे बच्चे जो पैर रहते हुए भी नहीं चल पाते, उनके इलाज में एक्यूप्रेशर का बड़ा योगदान है. जो बच्चे मंदबुद्धि हैं या फिर शरीर बड़ा हो गया और दिमाग विकसीत नहीं हुआ, उन्हें इस पद्धति से ठीक किया जा सकता है. हजारीबाग में दर्जनभर से अधिक मरीज ठीक भी हुए हैं.

एक्यूप्रेशर से ठीक होनेवाली बीमारियां

एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के माध्यम से घुटने में दर्द, साइटिका, गठिया, कमर दर्द, गर्दन दर्द, सर्वाइकल, स्पॉडिलाइटिस, माइग्रेन, सिर का दर्द, सिर चकराना, शुगर, बावासिर, परालाइसिस सहित कई तरह की बीमारियों से पूर्ण रूप से निजात पाया जा सकता है. डॉ असीम कहते हैं कि इन बीमारियों के लिए 3 दिन, 6 दिन या 12 दिन का नियमित कोर्स होता है, जिसे पूरा करने के बाद असर दिखाई देना शुरू हो जाता है. जब तक बीमार मरीज अपने पैरों पर खड़ा न हो जाए, तब तक उसकी सेवा जारी रहती है.

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