शिवसेना से छिना 37 साल पुराना पार्टी सिंबल, चुनाव आयोग ने क्यों लिया ये फैसला, अब उद्धव-शिंदे गुट के पास क्या विकल्प, 8 सवालों में जानें सबकुछ

1968 से पहले चुनाव आयोग ने चुनाव नियम, 1961 के संचालन के तहत अधिसूचना और कार्यकारी आदेश जारी किए। 1968 से पहले एक पार्टी का सबसे हाई-प्रोफाइल विभाजन 1964 में सीपीआई का था।

शिवसेना के सिंबल और नाम को लेकर उद्धव और शिंदे गुट की लड़ाई अब नए मोड़ पर आ गई। अंधेरी उपचुनाव से ठीक पहले चुनाव आयोग ने शिवसेना के चुनाव चिन्ह तीर-कमान के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है। चुनाव आयोग का ये फैसला दोनों गुटों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। ऐसे में अंधेरी उपचुनाव से पहले दोनों गुटों को नए सिंबल और नाम के साथ मैदान में उतरना पड़ सकता है। हालांकि चुनाव आयोग ने इतनी सहूलियत जरूर दी है कि दोनों गुट अपनी पार्टी के नाम के साथ सेना शब्द का इस्तेमाल कर सकते हैं। लेकिन अगले आदेश तक पार्टी का चुनाव चिन्ह और नाम के इस्तेमाल पर रोक बनी रहेगी। 

चुनाव आयोग ने शिवसेना के चुनाव चिन्ह पर क्यों लगाई रोक

8 अक्टूबर की शाम को पारित एक अंतरिम आदेश में भारतीय चुनाव आयोग (ईसीआई) ने शिवसेना के प्रसिद्ध ‘धनुष और तीर’ चुनाव चिन्ह को फ्रीज कर दिया। अपने आदेश के संचालन भाग ए में आयोग ने कहा कि न ही शिंदे समूह और न ठाकरे के नेतृत्व वाले धड़े को ‘शिवसेना’ नाम का उपयोग करने की अनुमति होगी। भाग (बी) में कहा गया कि न तो … समूह को … ‘शिवसेना’ के लिए आरक्षित ‘धनुष और तीर’ प्रतीक का उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी”; और (सी) के तहत दोनों … समूहों को ऐसे नामों से जाना जाएगा जो वे चुन सकते हैं। 

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क्या सिंबल फ्रीज होना असामान्य है?

जब कभी भी पार्टी विभाजित होती है, तो अक्सर उसके चुनाव चिन्ह के लिए संघर्ष होता है। इतिहास में जनता पार्टी से लेकर हालिया रामविलास पासवान की बनाई लोक जनशक्ति पार्टी तक के मामलों में सिंबल के फ्रीज को लेकर संघर्ष देखने को मिला है। किसी भी पार्टी का चुनाव चिन्ह उसकी पहचान का प्रतीक होता है और मतदाताओं के साथ उसका मौलिक संबंध भी स्थापित करता  है। दरअसल, भारतीय मतदाताओं को आमतौर पर यह कहते हुए सुना जाता है कि वे भाजपा, कांग्रेस या आम आदमी पार्टी कहने की जगह अक्सर”कमल का फूल” या “पंजा” या “झाड़ू” को वोट देंगे, ऐसा कहते हुए अमूमन पाए जाते हैं। पिछली बार चुनाव आयोग ने इसी तरह का फैसला अक्टूबर 2021 में लिया था, जब उसने लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के ‘बंगले’ के चुनाव चिन्ह को फ्रीज कर दिया था। शिवसेना के मामले की तरह, उस अवसर पर ये सुनिश्चित करना था कि लोजपा के दो गुटों में से दिवंगत रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान और भाई पशुपति कुमार पारस के नेतृत्व के धड़े इस्तेमाल को लेकर जंग ईसी के दरवाजे पर गई थी। एलजेपी में जून 2021 में विभाजन हुआ था। इससे पहले 2017 में समाजवादी पार्टी (साइकिल) और अन्नाद्रमुक (दो पत्ते) के बंटवारे के बाद चुनाव चिन्ह को लेकर खींचतान देखी गई थी।

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चुनाव आयोग कैसे तय करता है कि चुनाव चिन्ह किसे मिलेगा?

1968 का पैरा 15  जिसे चुनाव आयोग ने शिवसेना के मामले में उद्धृत किया है। पार्टी में जब भी फूट होती है तो चुनाव आयोग  द रिजर्वेशन सिंबल्स (रिजर्वेशन एंड अलॉटमेंट) ऑर्डर-1968 के पैरा 15 के तहत ही सिंबल पर फैसला करता है। चुनाव आयोग के पास जब मामला पहुंचता है कि इसमें विधायिका और संगठन दोनों देखे जाते हैं। इसके अनुसार जब आयोग संतुष्ट हो जाता है कि किसी मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के प्रतिद्वंद्वी वर्ग या समूह हैं, जिनमें से प्रत्येक की तरफ से पक्षकार होने का दावा किया जा रहा है। आयोग मामले के सभी उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए और सुनवाई करते हुए ये तय कर सकता है कि प्रतिद्वंद्वी वर्ग या समूह में से कोई भी नहीं है या समूह वह मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल है और आयोग का निर्णय ऐसे सभी प्रतिद्वंद्वी वर्गों या समूहों के लिए बाध्यकारी होगा। आयोग बंटवारे से पहले की मुख्य कमेटियों और निर्णय लेने वाली ईकाई की सूची निकालता है। इससे ये जानने की कोशिश होती है कि इसमें से कितने सदस्य या पदाधिकारी किस गुट के साथ हैं। इसके अलावा किस गुट में कितने सांसद और विधायक हैं। 

 1968 से पहले ऐसे मामलों में क्या होता था?

1968 से पहले चुनाव आयोग ने चुनाव नियम, 1961 के संचालन के तहत अधिसूचना और कार्यकारी आदेश जारी किए। 1968 से पहले एक पार्टी का सबसे हाई-प्रोफाइल विभाजन 1964 में सीपीआई का था। एक अलग समूह ने दिसंबर 1964 में इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया से संपर्क किया और उसे सीपीआई (मार्क्सवादी) के रूप में मान्यता देने का आग्रह किया। उन्होंने आंध्र प्रदेश, केरल और पश्चिम बंगाल के उन सांसदों और विधायकों की सूची प्रदान की जिन्होंने उनका समर्थन किया। चुनाव आयोग ने जब उसने पाया कि अलग-अलग समूह का समर्थन करने वाले सांसदों और विधायकों द्वारा प्राप्त वोट 3 राज्यों में 4% से अधिक थे तो इस गुट को सीपीआई (एम) के रूप में मान्यता दी गई। 

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 1968 के आदेश के तहत पहला मामले में क्या तय हुआ था?

1969 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में यह पहला विभाजन था। पार्टी के भीतर एक प्रतिद्वंद्वी समूह के साथ इंदिरा गांधी का तनाव 3 मई, 1969 को राष्ट्रपति डॉ जाकिर हुसैन की मृत्यु के साथ सामने आया। के कामराज, नीलम संजीव रेड्डी, एस निजलिंगप्पा और अतुल्य घोष के नेतृत्व में कांग्रेस के ओल्ड गार्ड्स जिन्हें सिंडिकेट के रूप में जाना जाता था। उन्होंने रेड्डी को पद के लिए नामित किया। प्रधानमंत्री इंदिरा ने उपराष्ट्रपति वीवी गिरी को निर्दलीय के रूप में चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया और पार्टी अध्यक्ष निजलिंगप्पा द्वारा जारी किए गए व्हिप की अवहेलना में “विवेक से वोट” का आह्वान किया। गिरि के जीतने के बाद, इंदिरा को कांग्रेस से निष्कासित कर दिया गया, और पार्टी निजलिंगप्पा के नेतृत्व वाली “पुरानी” कांग्रेस (ओ) और इंदिरा के नेतृत्व वाली “नई” कांग्रेस (जे) में विभाजित हो गई। “पुरानी” कांग्रेस ने बैलों के जोड़े के पार्टी चिन्ह को बरकरार रखा जबकि अलग हुए गुट को गाय- बछड़े का प्रतीक दिया गया था।

क्या प्रतीक विवाद को हल करने के लिए बहुमत परीक्षण के अलावा कोई रास्ता है?

चुनाव आयोग द्वारा अब तक तय किए गए लगभग सभी विवादों में, पार्टी के प्रतिनिधियों / पदाधिकारियों, सांसदों और विधायकों के स्पष्ट बहुमत के आधार पर फैसला किया है। शिवसेना के मामले में, पार्टी के अधिकांश निर्वाचित प्रतिनिधि शिंदे के पक्ष में चले गए हैं। ज्यादातर मामलों में आयोग ने पार्टी के पदाधिकारियों और चुने हुए प्रतिनिधियों के समर्थन के आधार पर सिंबल देने का फैसला किया है। हालांकि पदाधिकारियों की सूची को लेकर विवाद होने पर आयोग पूरी तरह से पार्टी के सांसदों और विधायकों के  बहुमत के आधार पर फैसला करता है। केवल 1987 में एमजी रामचंद्रन की मृत्यु के बाद अन्नाद्रमुक में विभाजन के मामले में आयोग को एक अजीबोगरीब स्थिति का सामना करना पड़ा। एमजीआर की पत्नी जानकी के नेतृत्व वाले समूह को अधिकांश सांसदों और विधायकों का समर्थन प्राप्त था, जबकि जे जयललिता को पार्टी संगठन में पर्याप्त बहुमत का समर्थन प्राप्त था। लेकिन इससे पहले कि चुनाव आयोग को यह निर्णय लेने के लिए मजबूर किया जाता कि किस समूह को पार्टी का चुनाव चिन्ह बरकरार रखना चाहिए, दोनों गुटों के बीच एक समझौता हो गया था।

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 उस समूह का क्या होता है जिसे मूल पार्टी का चिन्ह नहीं मिलता है?

पहले कांग्रेस विभाजन के मामले में, चुनाव आयोग ने कांग्रेस (ओ) के साथ-साथ अलग हुए गुट को भी मान्यता दी, जिसके अध्यक्ष जगजीवन राम थे। कांग्रेस (ओ) की कुछ राज्यों में पर्याप्त उपस्थिति थी और प्रतीक आदेश के पैरा 6 और 7 के तहत पार्टियों की मान्यता के लिए निर्धारित मानदंडों को पूरा कर रही थी। 1997 तक इस सिद्धांत का पालन किया गया। हालाँकि, जब आयोग ने कांग्रेस, जनता दल, आदि में विभाजन के मामलों को निपटाया, तो चीजें बदल गईं। इन विवादों के चलते ही सुख राम और अनिल शर्मा की हिमाचल विकास कांग्रेस, निपमाचा सिंह की मणिपुर, ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल तृणमूल कांग्रेस, लालू प्रसाद की राजद, नवीन पटनायक की बीजू जनता दल आदि बनी। 1997 में चुनाव आयोग ने नई पार्टियों को राज्य या राष्ट्रीय पार्टियों के रूप में मान्यता नहीं दी। उसे लगा कि केवल सांसद और विधायक का होना ही काफी नहीं है, क्योंकि निर्वाचित प्रतिनिधियों ने अपनी मूल पार्टी(अविभाजित) दलों के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीता था। इसके बाद चुनाव आयोग ने एक नया नियम पेश किया जिसके तहत पार्टी के अलग समूह खुद को एक अलग पार्टी के रूप में पंजीकृत करना पड़ा। पंजीकृत कराने के बाद राज्य या लोकसभा चुनावों में प्रदर्शन के आधार पर ही वो राष्ट्रीय या राज्य पार्टी दावा कर सकते हैं।

 उद्धव के तीन ऑप्शन

चुनाव आयोग की तरफ से शिवसेना के तीर कमान को फ्रीज किए जाने के बाद उद्धव गुट की तरफ से चुनाव आयोग की तीन ऑप्शन सुझाए गए हैं। उद्धव गुट त्रिशूल, उगता सूरज या मशाल के रूप में अपना चुनाव चिन्ह चाहता है। पार्टी के नाम के लिए भी तीन विकल्प आयोग को बताए गए हैं।  

-अभिनय आकाश

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