वो मंदिर जहां बच्चे को लेकर पहुंची मां को रहना होता है खामोश

रिपोर्ट- इम्तियाज़ अली

झुंझुनूं: जिले में माता का एक ऐसा मंदिर है जहां बच्चों के जात जड़ूले उतारते वक्त श्रद्धालु मौन रहते हैं. खासकर जिस बच्चे का जड़ूला उतारा जाता है, उसकी मां मंदिर परिसर में बोलती नहीं. इसके पीछे मान्यता है कि बोलने पर माता जात स्वीकार नहीं करती.

सिंघाना पंचायत समिति के मोई भारू पंचायत में स्थित देई माई (गूंगी माई) माता मंदिर कुठानिया धाम में वर्षों से यह परम्परा चली आ रही है. यहां छोटे बच्चे की जात लगाई जाती है. कहा जाता है कि जब तक बच्चे की जात नहीं लगाई जाती तब तक बच्चा बोलने नहीं लगता है. उसके बोलने व अच्छे स्वास्थ्य के लिए माता को धोक लगाने व जात जड़ूले उतारने वालाें की भीड़ लगी रहती है.

यहां पर गूंगी माई का मंदिर भी है. इन्हें विषेष तौर पर गूंगे, बहरों, अपंगों, अन्धों, कोढ़ियों व मानसिक विक्षिप्तों को ठीक करने के लिए पूजा जाता है. माना जाता है कि सभी अंग प्रत्यंगों का गर्भ में ही विकास करने वाली (अंग देने वाली ) माता श्री देई माई को सही से नहीं पूजा जाने पर ही ये सब विकृतियों मानव शरीर में होती हैं. जो गूंगी माई के आर्शीवाद से ही ठीक हो पाती हैं. इसीलिए इस मंदिर में पहले देई माई की पूजा होती है और उसके बाद गूंगी माई की. प्रदेश में इसके अलावा गूंगी माई का कहीं भी मंदिर नहीं है.

नौ माह मौन रहकर की थी तपस्या
मंदिर से जुड़े नरेंद्र सिंह के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि मां दुर्गा ने जब कन्या रूप में भंडारा किया था तब ‌भैरवनाथ ने भंडारे को अपवित्र करने के लिए मांस और मदिरा की मांग की थी. माता के मना करने पर उसने माता को ललकारा, तब माता ने छेत्रपाल के संरक्षण में 9 माह तक मौन रहकर भैरव का संहार करने के लिए सिद्धियां अर्जित की. इन 9 महीने में माता ने मौन रहकर ही जनता के दुख दूर किए. तभी से इनकी गूंगी माता के रूप में पूजा की जा रही है.

कहा जाता है कि इसके अलावा 1594 में अकबर ने मैया के विशाल मंदिर को तुड़वा दिया था. तब मंदिर तोड़ने वाले सिपाही और उनके बाल बच्चे गूंगे बहरे हो गए थे. जब यह बात अकबर को पता चली तो उसने और उसके सिपाहियो ने मंदिर में आकर माफी मांगी और मैया की जोत जलाई. तब सभी की आवाज वापस आ गई थी. तब से मुस्लिम समाज की औरतें भी मैया के दरबार में अपने बच्चों को धोक लगवाती हैं.

पाकिस्तान में है देई माता का मुख्य मंदिर
श्री देई माई ( गूंगी माई ) माता को जगदम्बा मातेश्वरी का ही रूप माना जाता है. पुराणों के अनुसार जब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र का इस्तेमाल कर माता सती के शव के टुकड़े किए थे तब जहां जहां माता सती के शरीर के अंग गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ कहलाए. इन्ही शक्तिपीठों में पहले स्थान पर हिंगलाज शक्तिपीठ है, जो पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में है. बताया जाता है कि यहां सती माता का मस्तक गिरा था. स्थानीय मुस्लिम भी हिंगलाज माता में आस्था रखते हैं और मन्दिर को सुरक्षा प्रदान करते हैं. मुस्लिम हिंगलाज माता मंदिर को नानी का मंदिर‘ कहते हैं. इसके अलावा जैसलमेर में आवड़ माता के नाम से भी इनका मंदिर है.

कैसे पहुंचे श्री कुठानिया धाम
श्री देई माई कुठानियां धाम ( गूंगी माई ) जिले की सिंघाना पंचायत समिति के कुठानिया गांव में है. मंदिर से सिंघाना कस्बे की दूरी महज 7 किलोमीटर है. सिंघाना में नारनौल बस स्टेंड चौराहा (सर्किल) है जहां से मंदिर के लिए ऑटो व टैक्सी मिलते हैं. सिंघाना कस्बे के मुख्य बाजार से बसें भी जाती हैं. बस स्टैंड से तातीजा जाने वाली बसें मंदिर के पास से होकर गुजरती हैं. इन बसों के आने व जाने का निश्चित समय होता है. सिंघाना के नारनौल बस स्टेंड सर्किल पर दिल्ली, जयपुर, सीकर, चिड़ावा, झुंझुनू, बीकानेर, बठिंडा, अलवर आदि सभी शहरों से सीधी बस सेवा है. यहां से 24 किमी दूर चिड़ावा रेल स्टेशन है. 50 किमी दूर लोहारू (हरियाणा) रेलवे स्टेशन से उतरकर बस के जरिए भी सिंघाना पहुंच सकते हैं.

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