यूपी की राज्यपाल आनंदीबेन ने कहा- प्राथमिक विद्यालयों से बच्चों को योग और संस्कृति की शिक्षा दी जाए

आनंदीबेन ने कहा, ‘जब मैं गुजराज की शिक्षा मंत्री थी, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्राथमिक स्कूलों से ही बच्चों को योग की शिक्षा देने को कहा। उस समय हमारे पास योग के प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी थी। हमने विद्या भारती से शिक्षकों को योग का प्रशिक्षण दिला कर योग की शिक्षा देनी शुरू की।’

उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने शनिवार को यहां विद्या भारती के एक कार्यक्रम में कहा कि बच्चों को प्राइमरी स्कूल से ही योग शिक्षा, संस्कृति का ज्ञान दिया जाना चाहिए। बच्चों के विकास के लिए उनको अच्छे संस्कार दिए जाने चाहिए।
अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान विद्या भारती द्वारा ज्वाला देवी इंटर कालेज परिसर में आयोजित संस्कृति महोत्सव को मुख्य अतिथि के तौर पर संबोधित करते हुए राज्यपाल ने कहा, “ हर बच्चे में कोई न कोई प्रतिभा होती है। इस तरह के कार्यक्रम के माध्यम से बच्चों के अंदर छिपी उनकी प्रतिभाओं को और निखारा जा सकता है।”

उन्होंने कहा कि नई शिक्षा नीति, इक्कीसवीं सदी के भारत की नींव तैयार करने वाली है। इस नीति की सबसे बड़ी विशेषता एक मजबूत अनुसंधान संस्कृति को बढ़ावा देना है।
आनंदीबेन ने कहा, “जब मैं गुजराज की शिक्षा मंत्री थी, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्राथमिक स्कूलों से ही बच्चों को योग की शिक्षा देने को कहा। उस समय हमारे पास योग के प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी थी। हमने विद्या भारती से शिक्षकों को योग का प्रशिक्षण दिला कर योग की शिक्षा देनी शुरू की।”

उन्होंने कहा, “बच्चों के भीतर जल संरक्षण, पर्यावरण संरक्षण का ज्ञान भी देना आवश्यक है ताकि आने वाली पीढ़ियों को हम एक बेहतर कल दे सकें। घर हो या पाठशाला हो, उतना ही पानी लीजिए जितनी जरूरत है। जल को बर्बाद मत करिए।”
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए विद्या भारती के राष्ट्रीय सह-संगठन मंत्री यतीन्द्र ने कहा, “विद्या भारती व्यक्ति निर्माण के क्षेत्र में काम करती है औऱ शिक्षा का मूल उद्देश्य भी यही है। मनुष्य जन्म से मनुष्य नहीं होता। संस्कृति उसे मनुष्य बनाती है।”

उन्होंने कहा, “विद्या भारती ने प्रारंभ से कहा है कि हिंदुत्व ही शिक्षा का अधिष्ठान इस देश का हो सकता है। इसलिए भारतीय चिंतन के आधार पर धर्म, संस्कृति, सभ्यता और दर्शन इस देश के नागरिक का निर्माण कर सकते हैं।”
उन्होंने कहा कि दीन दयाल जी हमेशा कहा करते थे कि शिक्षा ज्ञान, संस्कृति और चरित्र के संगम का महत्व बताती है।

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