तालिबान की पाकिस्तान को दुत्कार, भारत से दोस्ती का बढ़ाया हाथ, अफगानिस्तान में 20 दोबारा से होंगी शुरू?

भारत अफगानिस्तान में 20 रुकी हुई परियोजनाओं को फिर से शुरू कर सकता है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार परियोजनाओं के कार्यान्वयन से रोजगार के अवसरों में सुविधा होगी और अफगानिस्तान में विकास को बढ़ावा मिलेगा।

अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे के एक बरस बीत चुके हैं। तालिबान के काबुल पर कब्जे के साथ ही भारत के निवेश को लेकर तरह-तरह की चिताएं सामने आती रहीं। वहीं दूसरी तरफ तालिबान के हुक्मरानों की तरफ से भी  भारत से प्रोजेक्ट फिर से शुरू करने की बात भी कही जाती रही। भारत ने पिछले दो दशक में अफगानिस्तान में 22 हजार करोड़ से ज्यादा का निवेश किया। तमाम परियोजनाओं में पैसा लगाया। नवंबर 2020 में जेनेवा में अफगानिस्तान पर सम्मेलन में बोलते हुए एस जयशंकर ने कहा था कि अफगानिस्तान का कोई भी हिस्सा आज अछूता नहीं है। 400 से अधिक परियोजनाएं भारत ने अफगानिस्तान के 34 प्रांतों में शुरू की हैं।

20 प्रोजेक्ट फिर से होगा शुरू 

टोलो न्यूज ने बताया कि भारत अफगानिस्तान में 20 रुकी हुई परियोजनाओं को फिर से शुरू कर सकता है। अर्थशास्त्रियों के अनुसार परियोजनाओं के कार्यान्वयन से रोजगार के अवसरों में सुविधा होगी और अफगानिस्तान में विकास को बढ़ावा मिलेगा। अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता की बागडोर संभालने के बाद भारत को अपने सभी प्रोजेक्ट बंद करने पड़े थे। इसके बाद भारत ने अपना दूतावास बंद कर दिया था, जिसने कुछ महीने पहले फिर से काम करना शुरू कर दिया था। तालिबान ने कहा कि भारत अफगानिस्तान में 20 रुकी हुई परियोजनाओं को फिर से शुरू कर सकता है। टोलो न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान के शहरी विकास और आवास मंत्रालय (एमयूडीएच) ने कहा कि भारतीय प्रभारी भारत कुमार ने संबंधों को सुधारने और अफगानिस्तान में दिल्ली की परियोजनाओं को फिर से शुरू करने में भारत की रुचि व्यक्त की। कुमार ने शहरी विकास और आवास मंत्री हमदुल्ला नोमानी के साथ बैठक में यह टिप्पणी की। एजेंसी ने एमयूडीएच मंत्रालय के हवाले से कहा, ‘उम्मीद है कि भारत देश के कई प्रांतों में कम से कम 20 परियोजनाओं पर काम फिर से शुरू करेगा। कुमार ने काबुल में शहरी विकास और आवास मंत्री हमदुल्ला नोमानी के साथ बैठक में यह टिप्पणी की है। 

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भारत से  बढ़ती नजदीकी 

एमयूडीएच के प्रवक्ता मोहम्मद कमाल अफगान ने कहा कि परियोजनाओं को पूर्व सरकार के दौरान लागू किया गया था, लेकिन राजनीतिक परिवर्तन या अन्य मुद्दों के कारण देरी हुई। अब वे इन परियोजनाओं को फिर से शुरू करने में रुचि रखते हैं। अर्थशास्त्रियों ने कहा कि उनका मानना है कि परियोजनाओं के कार्यान्वयन से नौकरी के अवसर बढ़ेंगे और देश में विकास को बढ़ावा मिलेगा। एक अर्थशास्त्री नाज़कमिर ज़िरमल ने कहा कि इन परियोजनाओं के फिर से शुरू होने से लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकते हैं और यह लोगों की आय को बढ़ावा दे सकता है और अफगानिस्तान को राजनीतिक अलगाव से बाहर निकाल सकता है। पजवोक अफगान न्यूज ने इस बीच कहा कि शहरी विकास और भूमि मामलों के कार्यवाहक मंत्री मौलवी हमदुल्ला नोमानी ने भारतीय व्यापार समुदाय से अफगानिस्तान के शहरी विकास क्षेत्र में निवेश करने का आग्रह किया था। मंत्रालय ने अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा कि कार्यवाहक मंत्री नोमानी ने काबुल में भारतीय दूतावास के प्रभारी से मुलाकात की। इस यात्रा के दौरान, कार्यवाहक मंत्री नोमानी ने कहा कि “भारतीय व्यवसायी शहरी और आवास क्षेत्र में निवेश कर सकते हैं। नुमानी ने आगे कहा, “भारत ने अतीत में अफगानिस्तान में कुछ परियोजनाओं को लागू किया, जबकि भुगतान न होने के कारण उनमें से कुछ अधूरी रहीं।” उन्होंने भारत सरकार से अधूरी परियोजनाओं के बारे में भी अपना रुख स्पष्ट करने को कहा। एमयूडीएच के प्रवक्ता मोहम्मद कमाल अफगान ने कहा कि परियोजनाओं को पूर्व सरकार के दौरान लागू किया गया था, लेकिन राजनीतिक परिवर्तन या अन्य मुद्दों के कारण देरी हुई। अब वे इन परियोजनाओं को फिर से शुरू करने में रुचि रखते हैं। स्थानीय लोगों का मानना है कि परियोजनाओं को लागू करने से नौकरी के अवसर बढ़ेंगे, गरीबी और बेरोजगारी कम होगी और देश में विकास को बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा, अफगान इंजीनियरों की क्षमता को और बढ़ाने के लिए आने वाले भारतीय दूत से नागरिक और शहरी विकास क्षेत्र में मास्टर और पीएचडी डिग्री के लिए अफगान नागरिकों को छात्रवृत्ति प्रदान करने का अनुरोध किया गया था। मामलों के प्रभारी भरत कुमार ने कहा कि मंत्रालय सभी उल्लिखित परियोजनाओं के बारे में जानकारी साझा कर सकता है। वह भारत सरकार को उनकी समस्याओं को हल करने और सभी परियोजनाओं को उपयोग के लिए तैयार करने का संदेश देंगे।

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अफगानिस्तान की आजादी के बाद से ही अटूट रहा है रिश्ता

वैसे आपको बता दें कि भारत और अफगानिस्तान के बीच दोस्ताना संबंध काफी पुराने हैं। 1919 में अफगानिस्तान की आजादी के बाद से ही भारत से उसका अटूट रिश्ता रहा है। हालांकि बीच में कुछ साल ऐसे रहे जब इन रिश्तों पर बर्फ जम गई है। 1996 और 2001 के बीच का दौर भी ऐसा ही था। उस समय अफगानिस्तान में तालिबान का शासन था। उस वक्त भारत के अलावा कई देश ऐसे थे, जिन्होंने अफगानिस्तान से वास्ता नहीं रखा। दिसंबर 2001 में अमेरिका की मदद से अतंरिम सरकार बनी और इसके चेयरमैन हामिद करजई बने जो आगे चलकर राष्ट्रपति बन गए। यहां से भारत और अफगानिस्तान की दोस्ती का नया दौर शुरू हुआ जो हाल तक बरकरार रहा। इस दौरान भारत ने अफगानिस्तान में संसद भवन, कई महत्वपूर्ण सड़कें, बांध, बिजली, सप्लाई लाइन, स्कूल और अस्पतालों के निर्माण में सहयोग दिया। 2011 में भारत अफगानिस्तान रणनीतिक साझेदारी समझौता हुआ। इसके तहत भारत ने अफगानिस्तान में इंफ्रास्ट्रक्चर और संस्थानों के पुनर्निर्माण का भरोसा दिलाया। कई क्षेत्रों में तकनीकि सहायता देने के लिए भारत आगे आया। 

भारत द्वारा समर्थित कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं

अफगानिस्तान में भारत द्वारा समर्थित महत्वपूर्ण परियोजनाएं थीं। हेरात प्रांत में 42MW सलमा बांध का उद्घाटन 2016 में किया गया था और इसे अफगान-भारत मैत्री बांध के रूप में जाना जाता है। अन्य हाई-प्रोफाइल परियोजना सीमा सड़क संगठन द्वारा निर्मित 218-किमी जरांज-डेलाराम राजमार्ग थी। जरांज ईरान के साथ अफगानिस्तान की सीमा के करीब स्थित है। भारत ने काबुल में 90 मिलियन डॉलर में अफगान संसद का निर्माण किया। इमारत में एक ब्लॉक का नाम पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर रखा गया है। 2016 में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी और प्रधान मंत्री मोदी ने काबुल में पुनर्स्थापित स्टोर पैलेस का उद्घाटन किया, जिसे शुरू में 19वीं शताब्दी के अंत में बनाया गया था। भारत ने काबुल में अपने अग्रणी अस्पतालों में से एक का निर्माण भी किया। 

 फिर तालिबान की एंट्री

 अगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता की बागडोर संभालने के बाद भारत को अपने सभी प्रोजेक्ट बंद करने पड़े थे। इसके बाद भारत ने अपना दूतावास बंद कर दिया था, जिसने कुछ महीने पहले फिर से काम करना शुरू कर दिया था। भारत में अभी भी सुरक्षा के मुद्दे हैं क्योंकि हाल ही में संदिग्ध इस्लामिक स्टेट आतंकवादियों द्वारा कई नागरिक परियोजनाओं, धार्मिक स्थलों और रूसी दूतावास को निशाना बनाया गया था। तालिबान द्वारा अफगानिस्तान के अधिग्रहण से पहले भारत ने लगभग तीन बिलियन डॉलर की विकासात्मक और क्षमता निर्माण परियोजनाओं में निवेश किया था। -अभिनय आकाश

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