जबरन धर्मांतरण: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से उठाए गए कदमों पर मांगा विस्तृत हलफनामा, अब सोमवार को होगी सुनवाई

ANI

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार में दूसरे लोगों को धर्म विशेष में धर्मांतरित कराने का अधिकार शामिल नहीं है। केंद्र ने यह भी कहा कि यह निश्चित रूप से किसी व्यक्ति को धोखाधड़ी, धोखे, जबरदस्ती या प्रलोभन के जरिए धर्मांतरित करने का अधिकार नहीं देता है।

जबरन धर्मांतरण को लेकर लगातार सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से धर्मांतरण विरोधी कानूनों पर राज्य सरकारों से जानकारी एकत्र करने के बाद एक विस्तृत हलफनामा दायर करने को कहा है। अब इस मामले में अगली सुनवाई 12 दिसंबर को होगी। सुप्रीम कोर्ट का साफ तौर पर कहना है कि जबरन या धोखे से धर्म परिवर्तन का मुद्दा गंभीर है। सुप्रीम कोर्ट एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रहा था जिसमें दावा किया गया था कि देश भर में धोखाधड़ी और धोखे से धर्म परिवर्तन हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने आज भी इस पर तीखी टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि चैरिटी और समाज सेवा अच्छी बात है। लेकिन इसके पीछे कोई गलत उद्देश्य नहीं होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता के अनुसार किसी भी धर्म को स्वीकार करने का अधिकार है। लेकिन जबरदस्ती, प्रलोभन या धोखे से नहीं। कोर्ट ने इस मामले में केंद्र सरकार से उठाए गए कदमों की विस्तृत जानकारी भी मांगी है।

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वहीं, केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा था कि धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार में दूसरे लोगों को धर्म विशेष में धर्मांतरित कराने का अधिकार शामिल नहीं है। केंद्र ने यह भी कहा कि यह निश्चित रूप से किसी व्यक्ति को धोखाधड़ी, धोखे, जबरदस्ती या प्रलोभन के जरिए धर्मांतरित करने का अधिकार नहीं देता है। केंद्र सरकार ने कहा कि उसे खतरे का संज्ञान है और इस तरह की प्रथाओं पर काबू पाने वाले कानून समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक हैं। इन वर्गों में महिलाएं और आर्थिक एवं सामाजिक रूप से पिछड़े लोग शामिल हैं। केंद्र ने यह भी बताया था कि ओडिशा, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, झारखंड, कर्नाटक और हरियाणा – ने जबरन धर्मांतरण पर नियंत्रण के लिए कानून पारित किए हैं।

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सुप्रीम कोर्ट ने जबरन धर्मांतरण को ‘बहुत गंभीर’ मुद्दा करार देते हुए केंद्र से कहा था कि वह इसे रोकने के लिए कदम उठाए और इस दिशा में गंभीर प्रयास करे। अदालत ने चेताया कि यदि जबरन धर्मांतरण को नहीं रोका गया तो ‘‘बहुत मुश्किल स्थिति’’ पैदा होगी, क्योंकि वे राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिकों के धर्म और अंत:करण की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं। न्यायमूर्ति एम.आर. शाह और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि सरकार प्रलोभन के जरिए धर्मांतरण पर अंकुश लगाने के लिये उठाए गए कदमों के बारे में बताए। 

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