छत्तीसगढ़ी म पढ़व- मां अंगारमोती के दरबार

उही हाल गौरा-गौरी परब के हे. कतेक ला ओरियाबे, गिनत अउ ओकर मन के महिमा ला गोठियावत बतावत रहिबे ते रात पहा जही फेर ये कथा पुरान नइ सिरावय. अभी कुछेक महीना पहिली के बात होही, बस्तर मं माता लिंगेश्वरी देवी के महिमा के गोठ-बात होय रिहिसे, कोंडागांव तहसील मं आलोर नाव के एक ठन गांव हे तिहां पहाड़ी के नीचे मं गुफा हे. उहां लिंगेश्वरी देवी के मंदिर हे. ओ मंदिर के कपाट साल मं एक घौं खुलथे, ये देवी के महिमा ये हे के जउन शादी-शुदा युवती होथे ओमन संतान कामना खातिर इहां मन्नत मांगे ले आथे. मनोकामना पूरा होथे तब चढ़ावा देके वापिस अपन-अपन घर लहुट जथे.

अभी वइसने कस किस्सा फेर सुने ले मिलिस. धमतरी जिला मं अंगारमोती नांव के देवी के मंदिर हे. अभी परगट देखे-सुने ले मिलिस. ये मां अंगारमोती के दरबार ठीक देवारी तिहार के बाद जउन शुक्रवार परिसे उही दिन पुरातन परम्परा के मुताबिक बावन गांव के मनखे जुरियाथे? एला ओमन गंगरेल मड़ई-मेला के नांव देथे. इहें ओ माता अंगारमोती के दरबार लगथे. कटाकट मनखे के भीड़, देखत बनथे. ये माता के मंदिर मं ए पइत जउन दरबार लगे रिहिसे तेमां करीब तीन सौ सुहागिन जेकर एको झन संतान नइ रिहिन हे. ओमन मंदिर के मुख्य दरवाजा मं ओरी-ओर (लाइन मं) चित घोंडे (लेटे) रिहिन हे.

विधि-विधान के मुताबिक मंदिर के मुख्य पुजारी लेटे रिहिन हे तेन सुहागिन मन के ऊपर ले रेंगत मंदिर मं गिस. ओ पुजारी के संग मं तीन झन बइगा घला रिहिन हे. बताथें- ये परंपरा कब ले चलत आवात हे, कोनो ल ठीक ढंग ले नइ मालूम. बस एके रटे-रटाय बात सबे झन गोठियाथे- ये परम्परा सदियों ले चलत आवत हे. आस्था अउ विश्वास के चलते सब ये मइया के दरबार मं खींचे चले आथे. बेटी मन के काहे, संतान ओकर मन बर सबले बड़े धन हे. संतानहीन बहिनी बेटी मन ला ये संसार सुन्ना-सुन्ना लगथे. घर-दुआर, धन-दौलत, पति सबे कुछु हे फेर एक संतान बिगन ओ सब कुछ ओकर मन माटी बरोबर हे. तडफ़त अउ भटकत रहिथे- संतान के खातिर डीह मं कोनो दीया बरइया कुलदीपक तो हो जतिस. जउन भी संतानहीन बेटी-माई मां अंगार मोती के दरबार म अपन अचरा ल फइलाय हे, मन्नत मांगे हे, मां ओकर मन के मनोकामना पूरा करे हे.

मां अंगारमोती मंदिर के मुख्य पुजारी ईश्वर नेताम ये परंपरा के बारे मं बताथे- ये परंपरा सदियों साल पुराना हे. संतानहीन महिला मन अपन मनोकामना ले के आथे अउ मंदिर के आघू में कतार के लाइन से बाल खुल्ला करके लेट जथे. ओकर मन के हाथ मं फूल, नीबू अउ नारियल होथे. ओकर मन ऊपर रेंगत मंदिर जाथौं. आस्था अउ विश्वास के फल ओमन ल मिलथे. तब तो इहां हर साल सैकड़ों के भीड़ जुड़ जथे.

(परमानंद वर्मा छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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FIRST PUBLISHED : November 02, 2022, 08:30 IST

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