छत्तीसगढ़ी म पढ़व- घर म एक ठन गाय नहीं बाय! – claim to someone elses things story on chhattisgarhi parmanand verma – News18 हिंदी

कोन जनी वाजिब मं मोर ये चमकी-धमकी ल सुनके ओहर अतेक डर्रागे का, ते एसो अइसन अकन झोरफा-झोरफा फर धर ले हे के घर वाले मन ला कोन काहय, गली के अवइया-जवइया, रेंगइया मन के आंखी घला हा चौंधियागे हे. संझा-बिहनिया ये सीताफल के पेड़ मं लगे फल ल देख के काहत फिरत अउ गोठियावत रहिथे- अई, देख तो ओ, ये दे भइया के घर मं कइसन अकन सीताफल फरे हे.

अब ककरो आंखी ला तो तोपे नइ सकस. जउन फरे ते तउन तो दिखबे करही. छोटे-बड़े फर ला देख के ओ अवइया-जवइया मन के मुंह मं लार चुचवाय ले धर लेथे. कहूं झिमझाम अउ सुन्ना मउका दीखथे, तहां पहुंच जथे बेंदरा मन असन सीताफल ल टोरे बर. अब पेड़ ह घर के बाहिर पार परदा तीर मं लगे हे तब सबे झन अइसे समझथे, ये घर मालिक के थोरे हे, ये सीताफल ल सबे टोर सकत हे, सबके ओकर ऊपर अधिकार हे.

बात कोनो गलत नइ काहय ओमन, सबे अपन हक समझथे, जइसे गरीब के लुगई सबके भउजी कहाथे तइसने कभू-कभू तो ये पेड़ के नांव लेके झगरा होय के नौबत घला आगे हे. फेर चल रे भई, बाहिर पार हे तब काबर हक जतावन, इही सोच के रहि जथन तब कतको झन मुड़ी ऊपर चढ़े ले धरथे. एक दिन माइलोगिन ल टोरत देख परेंव. ओहर रोज फूलटोरे ले आथे. फूल के घला पेड़-पौधा लगे हे दुआरी मं, ले जाथे टोर के. उही नहीं अउ कतको झन आथे फूल टोरे बर. चल भई देवता-धामी के काम मं आथे, सोचके नइ बरजन, फेर ओ दिन फूल टोरे के बाद सीताफल ल टोरे ले धर परे रिहिसे.

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मध्य प्रदेश

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सीका के टूटती अउ बिलई के झपट्टी कस ओतके बेर उदूक ले कोनो कोती ले मउका मं पहुंचगेंव. मोला देखते साठ धंधमंधागे, जइसे चोरी करत कोनो चोर रंगे हाथ पकड़ा जथे. ओहर कुछु कहितिस-बोलतिस तेकर पहिली मैं ओला थोकन डेर्राय असन भाखा मं कहेंव- कस बाई, तैं फूल टोरत हस ते सीताफल? मोर भाखा ल सुनके सुकुरदुम होगे. चोरी तो पकड़ागे रिहिसे का कहितिस तभो ले चोर मन जईसे अउ अदालत मं अपन सफाई देवत कहिथे- तइसने ओ बाई हा कहिथे- नहीं भइया, देखत हौं के ठन फरे हे, के ठन छोटे हे अउ के ठन बड़े हे?

ओला केहेंव- तोला एती झांके के का जरूरत हे बाई, फूल टोरे बर आय हस तब फूल ओ कोती हे, जा टोर, फेर तैं तो पांव ल टमड़त-टमड़त सरी अंग ल शरीर के टमड़ लेथौ तइसे टमड़त हस, ए तो ठीक बात नइहे. बमकगे मोर बात ल सुनके, कइसे गोठियाथस गा तैंहर, अइसने कोनो पर नारी संग गोठियाही?

का गलत कहि परेंव ओ तोला जेमा बिलई असन गुर्रियाय ले धर लेहस, एक तो चोरी अउ ऊपर ले सीना जोरी करत हस. बात बढग़े, तेज आवाज मं बातचीत होवत देखिन तहां ले गली के रेंगइया, अवइया-जवइया मन झूमगे. का बात हे, कइसे का होगे तेमा?

दूनो कोती के बात सुनिन, वाजिब मं चार-पांच ठन सीताफल ल टोर के ओ बाई हा अपन झोली मं धर डरे रिहिसे. कइसनो करके मही झगरा असन होवत रिहिसे तउन बात ल शांत करेंव अउ कहेंव- ले जा बाई, जतका अकन टोर डरे बने करे. अउ कोनो दिन आ जबे, ससनभर टोर लेबे, तोरे बर तो लगाय हौं दाई. महीं अपन गलती ल मानेंव, बाहिर पार ये पेड़ ला लगा के गलती करे हौं. आवव, जेकर जतका मन लागय टोर के ले जाऔ. हमर का हक हे एमा. हम तो रखवार हन, देखत रहिथन टुकुर-टुकुर संझा-बिहनिया.

ओ दिन होइस का, बने बड़े जनिक सीताफल ह पाकगे गिरगे राहय सब छर्री-दर्री होगे राहय. उठावत नइ बनिस देखत रहिगेंव. नजर ओकर ऊपर रिहिसे बने पाकही तहां ले टोरहूं कइके, फेर अड़हा जीव काचा-पाका के रसकस ल नइ जानेंव अउ ओ दिन ओहर वइसने भुइयां मं गिरगे राहय जइसे भरे जवानी ल माइलोगिन मन नइ संभाल पाय तहां ले कोनो ल धर के भाग जथे अइसन कतको ठन घटना देखे, सुने अउ पढ़े ले मिले हे. वइसने कस हाल होगे ओ सीताफल के. ओकर एक जीवन बरबाद होगे सदा दिन बर, मोला तरस आवत हे, ओकर दुरदशा ल देख के, के मैं ओकर कोनो काम नइ आ सकेंव. का कइही, का समझही ओहर मोला. अब होनी ल तो कोन टार नइ सकय. जउन होना हे तउन तो होगे.

(परमानंद वर्मा छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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