छत्तीसगढ़ी म पढ़व- गोबर दे बछरू गोबर दे

जउन कथा भागवत सुने हौं, नानपन मं अउ दाई-ददा करा ले सीखे-पढ़े, जाने अउ गुने हौं, ओतके ल हिरदय मं गठरी असन बांध के घर ले आय हौं अउ बड़ा सुजानिक बन असन गियान मौकन-बेमौका बघारत रहिथौं. तब ए गलती के सेती सुजानिक अउ गियानी मनखे मन करा हाथ जोर के माफी मांगत हौं. अपन लइका, भाई अउ बेटा सही जानके माफी कर दे करिहौ.

हां, तब आवत हन अपन असली विषय ऊपर जेकर इहां चरचा करे के मन होवत हे तब अपन विचार ल सुजानिक मन करा बइठ के साझा करे बर रखथौं. अभी ओ दिन छत्तीसगढ़ी ओलम्पिक खेल छत्तीसगढ़ सरकार हा जघा-जघा रखवाय रिहिसे. बड़ सुग्घर अउ नीक लगिस ओ खेल मन ला देख के. पहिली लइका पन मं गांव मन मं अइसन खेल होवय, आजो होथे. ये तो कोन जनी कब ले होवत आवत हे. लगथे सनातन ले एहर चलत आवत हे. हमू मन खेले हन. स्कूल जावन तब घंटी नइ बाजे अउ पराथना नइ होय के पहिली मन होके खेलन अउ जइसे घंटी बाजय, पराथना होय के बेरा होवय तहां ले दोर-दोर ले दइहान ले उसले गाय-गरवा मन असन स्कूल कोती भागन. छुट्टी होवय तहां ले फेर घर मं बस्ता ल पटकन अउ फेर निकल जन इही खेल ला खेले बर. कइसन सुग्घर खेल-खेल मं खेलते-खेलत बाढ़ गेन अउ पढ़ लिखे के सुजानिक बनगेन अउ जिनगी के सफर मं चले लगेन.
बात गउ, गोबर, बछरु अउ मनखे तीर ले शुरू करत रेहेन, अउ कूदगेन खेलकूद मं. का करबे बचपन के दिन ल भुलाय के कोशिश करथ, फेर भुलाय के नांव नइ लेवय. इही बात ला तो भगवान श्रीकृष्ण, उद्धव ल घला सुनावत कहिथे- कहि ना जाय का कहिये केशव…. उद्धव देखथे भगवान के मन घबरागे हे, ओला कुछु बात के सुरता आगे हे. साहस करके पूछथे- का बात हे भगवान, कुछु खास-सोच विचार करत हौ का? तब कृष्ण बताथे- हां उद्धव, मोला रहि-रहि के गोकुल के सुरता आवत रहिते, मइया जसोदा, नंद बाबा, गोप-गुवालिन अउ वृंदावन, जमुना घाट सुरता आवत रहिते, मोर हिरदय ल झकझोरत रहिते. अइसे लगथे, जइसे ओमन मोर आये के रस्दा जोहत हे. ओमन ला वादा करके आय हौं, मइया, बाबा, सखा-सखी, गउ माता मैं चार दिन बर तो जाथौं. आहूं जल्दी लहुट के आहू. मैं देखतौं, ओकर मन के आंखी ले आंसूर झरत हे, मोर सुरता मं. बचपन मं मोला कतेक पिंयार अउ दुलाह दे रिहिन हे.

उद्धव ला चिट्ठी लिखे के दे रिहिसे कृष्ण ओकर मन के मन लो बंधाय खातिर. फेर ओ चिट्ठी बेअसर होगे. जेकर मन के नयन मं बाल-गोपाल हे, संझा-बिहनिया जेकर नाम के रटन करत हे, तेखर आघू मं चिट्ठी के परभाव परइया हे. एला कहिथन बचपन, गांव के सुरता. तब उही सुरता आजो सबो संगी, संगवारी, भाई-बहिनी मन के हिरदे मं बसे हो. बियाकुल कर देथे ये सुरता अउ ओ पिंयार.

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ये हिरदय ह तो गऊ हे, इही मं ओ बछरु जइसन पिंयार समाय हे, बसे हे. जइसे बछरू ऐती-ओती मेछरावत अपन महतारी के आंखी तीर ले ओझल हो जथे, रंभाय ले धर लेथे, छटपटाय ले धर लेथे कोन कोती निकलगे मोर पिलवा. फेर का करय, गेरुवा मं बंधाय रहिथे. रंभा-रंभा के रहि जाथे. पहाटिया या घर मालिक ओ बछरू ल खोज के लाथे तब ओकर सांस मं सांस आथे.
ये गाय, बछरू के गोबर के बड़ महिमा हे. जउन एला अपन माथा मं तिलक लगाते ओमन बड़ पुन्न के भागी होथे, गउ माता के ओमन ला आसीस मिलते. ककरो नजर नइ लगय. महतारी मन टोटका ले बचाय खातिर लइका मन के आंखी करा गोबर लगा देथे. आजकल के ज्यादा पढ़े-लिखे सुजानिक मन एला अंधविश्वास कहिथे फेर ‘बेंदरा का जानय अदरक के सुवाद ल तइसे कस एमन होथे.

सब जानत, सुनत अउ समझत होहू मे दाई, बहिनी, बेटी मन रोज बिहनिया घर के परछी, अंगना ल गाय-बछरू के गोबर ले लिपथे. ओ घर बहुत सुंदर अउ पबरित लगथे जउन गोबर ले लिपाय रहिथे. अतके नहीं घर के बाहिर घला गोबर पानी के छरा-छिटका देथे. काबर देथे, कुछु तो कारन होही, कारन कुछु नहीं, कारन एके हे सगुन होथे गोबर ले लिपाय घर हा. लछमी के वास होथे अइसन घर मं. लछमी आने सुख, शांति अउ परेम, धन के बरकत होथे. पहिली तो घर-घर मं गोबर के कंडा बनावय, बिहिनिया छेना बीना पर जाय. कहां-कहां ले नइ बीन के लानय गोबर के छेना. मरे बर तो नइ जात रिहिन हे, ओमन गोबर छेना बीने पर, कुछु तो कारन हे? फेर आज ये कारन के कोनो जनइया अउ समझइया नइहे. मूरख होगे हे मनखे. कोन जनी कते कोती ले, कोन गुरु के गियान मिल गे छत्तीसगढ़ के मुखिया ला के ओहर गोधन योजना शुरू करे हे. कोनो जनम के ओकर पुन्न जागिस होही? नइते जतके सरकार बनिस तउन मन तो अंधरा रिहिन हे जउन मन गउ के कदर करना नइ जानिन उही पाके ठेंगवा चाटत गिन धारे-धार.

(परमानंद वर्मा छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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