छत्तीसगढ़ी म पढ़व: कका-भतीजा के गोठ – different kind of changes in life chhattisgarhi shatrughan singh rajput – News18 हिंदी

बंसी कका हुशियार त चंदू भतिजा डेढ़ हुशियार हे. उनकर गोठ कभू अम्मठ कभू चाशनी कस मीठ होथे. भतिजा के सवाल कभू मिसाइल बरोबर होथे तब कका के जवाब वज्र (इंद्र देव का एक हथियार) कस जनाथे. ठेठ मनोरंजक गोठ के मजा सब लेथें. कका अपन धुन के पक्का हे. जिद्द म अड़ जथे. गुनिक घलो हे. भतिजा भुनभुनावत रही जथे. अपन ल हुशियारे समझथे. कका ह सहरिया कम ठेठ गँवइहा मिजाज वाले हे. भतिजा गाँव म रहिथे अउ खुद ल सहरिया समझथे.. सहरिया मिंजाज ओला भाथे.

भतिजा के मोबाइल सुख
एक दिन कका ह अपन गाँव के मैदान म भंवरा घुमावत रिहिस. भतिजा मोबाइल म भिड़े दिखिस. कका खिसियइस अरे! चंदू मैदान म खड़े हस तभो ले तोर हाथ ले मोबाइल नइ छूटे हे. दिन होय चाहे रात मोबाइले ल कोचकत रहिथस’. भतिजा-‘कका, मिहीह का ग पूरा दुनिया मोबाइल के पाछू पगलाय हे. हाथ म मोबाइल रेहे ले अइसे लागथे जइसे दुनिया मुठा म समागे हे. येखर बिन एक मिनट चैन नइ मिले गा, गउकिन. नानकुन मोबाइल म बड़े-बड़े गुन हे’. कका-‘मोबाइल के बिना तुमन एक कदम नइ रेंगव, रे !!. भतिजा-‘कका तेंहा त जब्बर नेता आस जानत हस के मोबाइल से सबे बुता होवत हे. मोबाइल ह मनखे के गोड़, हाथ, आँखी, कान सब होगे हे. ओखर बिन थथमरासी लागथे गा. मोबाइल के नइ रेहे ले जिनगी घर दुआर सब सुन्ना लागथे. ओखर बिना परभरोसा होय कस लागथे. तेंहा त मोबाइल के महिमा ल बने जाथस फेर खिसियाथस काबर ? हम का नान-नान लइका मन से घलो गे बिते हन ?’ कका-‘मेंहा मोबाइल के बिरोधी थोरे हों रे ! भकला. उही म बुड़ें झन राहो कथों’.तुमन त दिन-रात अपन आँखी ल मोबाइल स्क्रीन म गड़ाय रहिथव. घर-बाहिर के कोनो बुता ल करहू के बस मोबाइल के सागर म डूबकत रहू ?.

भंवरा, बांटी खेले के मजा
भतिजा-‘हम ल न भंवरा घुमाय बर आय न बांटी खेले बर अइसन म हम का करन ?’. कका (जोरदरहा हांसत-हांसत ) छत्तीसगढ़ के खेल-संस्कृति ल सब भूलागे हव रे! अपन मोबाइल ल खीसा म धरो. अपन संवारी मन ल घलो बलाव. मेंहा तुमन ल भंवरा-बांटी खेले बर सिखोवत हंव’. भतिजा-‘कका, भंवरा-बांटी खेले ले का फायदा हे’.? कका-‘ स्वस्थ रेहे बर खेल जरूरी हे. खेल ल खेले से मजा आथे रे, तुमन लेड़गाच हो जहूँ का रे ? देखो ये डाहर. (अउ कका हर झट भंवरा ल नेती म लपेटिस अउ हाथ ल घुमइस. वाह ..वाह..भंवरा रटठमार दिस. कका ह ओला हाथ म ले के चलइस) किहिस-‘ ये डाहर आ. हथेली ल देखा अउ भून्नावत भंवरा ल ओखर हथेली म ढूला दिस. भतीजा मगन होगे. देखइया मन घलो खुश होइंन. उन ताली बजइंन. किहिन वाह..वाह कका बड़ मजा अइस गा !! भतिजा ह कका जाब्बूझ के कोचक के किहिस-‘कका, एमा कोन बड़े बात हे’?

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कका के करतब
कका-‘अच्छा, मैदान म उतरो तब पता लगही. हर खेल म मजा हे. गोचकुल (गड्डढा विशेष) म बाँटी बुड़ो के देखा. बांटी से बांटी ल मारतूल से निशाना लगा के बता. बांटी के कई ठन खेल हे. भतिजा-‘ लेन कका तिहीं देखा न गा’. कका किहिस देख, ( कका बांटी खेले के कला देखइस). माई अंगरी ले बांटी ल गोचकुल म बुड़ोइस. मार्तूल ले बांटी उपर अचूक निशाना लगइस. ओ तिर बहुत झन लइका मन सकलागें. उन खूब ताली बजाइन. कका के करतब देख के भतिजा अउ ओखर संगवारी मन घलो भंवरा चलाय के अभ्यास करिंन . बांटी, भंवरा के खेल सिखिंन..

मिसाइल जुग
भतीजा प्रश्न झर्रइस. पूछिस-कका, तुमन अपन बचपन म कबड्डी, कुश्ती. गोला फेंक खेलत रेहेव का ? हमर जुग त मिसाइल जुग आय न’. कका-‘बेटा, मिसाइल के बुता देश के सीमा म हे. वो त हमर देश के बहादुर जवान मन के खेलौना आय. हमन तुंहर उमर म खूब कबड्डी खेले हन रे ! तभे त हम बड़े बड़े बुता ल करत हन !! बटकी म बासी, ओमा महि अउ पताल संग हरियर मिरचा, धनिया के चटनी पेट भर खाय अउ पेज(माड़) पिए मनखे आन. गरमी के दिन म बासी म महि डार के गोंदली (प्याज)लसून, लाल मिरचा के चटनी ओमा लिमउ निचो के खाय पिए हन. हर छत्तीसगढ़िया ये मजा ल खूब जानथे. कतको घाम होय हमन खेलन कूदन. मीलों दउड़न, गाय के दूध पियन, घी चुपर के अंगाकर रोटी बारी के साग भाजी खावन. अंगाकर रोटी धर के स्कूल जान. वाह मउका देख के मुसुर-मुसुर खावन. तभे त ये स्ट्रांग बाडी हे रे !.

ओ कुश्ती के दिन
स्कूल के रेती म रोजे कुश्ती खेलन. मुग्दल घुमावन. बदन बनावन. कबड्डी ल हमन खुडवा कथन’. कका ह गोठियात-गोठियात मूड म आगे. फेर किहिस-‘बचपन म भाला, गोला फेंके खूब खेलेन. तभे त हम राजनीति म घलो भाला फेंक, गोला फेंक जारी रखे हन. ओखर रूप बदलगे हे. कुश्ती के पैंतरा घलो आज राजनीति म काम आवत हे’. भतिजा-‘तुमन स्कूल अउ छूट्टी म खेलते राहव त पढ्त कब रेहेव ?’ कका-‘हमन खेलते खेलते पढ़न अउ पढ़ते पढ़ते खेलन’ भतिजा-‘कहाँ तक पढ़े हो ककाजी’ ? कका-‘जिहाँ तक पढ़े हँन, नइ पढ़े हन सब ठीक हे. जादा पढ़े रर्हितेंन त राजनीति के मलई थोड़े खातेंन बेटाजी.

शरीर हो स्वस्थ
(कका गंभीर हो के किहिस) तुमन ढोलक बरोबर दिन रात बाजत रहिथव’. दूध पियो, कसरत करो. पल्ला भागव, कबड्डी खेलो, बदन बनाव. ये का फिलफिली बरोबर देहें हे. एक बखत जोर से फूंक देहूं त चार चक्कर घूम जहूँ. भतिजा-‘अब, शुद्ध दूध के जमाना गे. अखाड़ा के जगा जिम आगे. मनखे आधुनिक होगें’. कका-‘तन-मन सुंदर होना चाही.खूब खेलो, खूब कूदो. पहिली हर स्कूल म खेल अनिवार्य राहय. एक पीरियड, दू पीरियड रोजे खेल होय. हर सनिच्चर व्यायाम, खेलकूद, सांस्कृतिक कार्यक्रम होय. खूब मजा आय. भतीजा-‘कका, हमर स्कूल म त बड़ अंधेर हे. सालों-साल ले सब खेलकूद, व्यायाम कागज म हो जथे. हर साल पढ़ई म काय काय अदल-बदल होवत रहिथे.’ कका-‘कोन जनी रे !! लइका मन कापी –किताब के बोझा धरे-धरे स्कूल जाथें-आथें. इंटरनेट गुरू संग मोबाइल, कम्प्यूटर म भिड़े रहिथें. जस तोर हाल तस सबे लइका के हाल हे,रे!. लइका मन अपने धुन म रहिथें. खेलथें कम. बचपन खेले बर भुलात हें.एखे सेती छत्तीसगढ़ म छत्तीसगढिया ओलम्पिक होवत हे.

चकमक पथरा अउ पोनी
भतिजा-‘ये अगम बिसय आय गा एला छोड़. ये बता के तुमन अउ कोन-कोन खेल खेलत रेहेव. बंसी कका-‘खेलकूद घलो ह कथा कहिनी कस होगे हे !! हमर समे म गिल्ली डंडा जरूर राहय. एक ठन डंडा (लउठी) अउ एक ठन गिल्ली दु दल. बोदका गिल्ली ल डंडा से रटठा के परे गिल्ली ह खूब दुरिहा जाय. जइसे खिलाड़ी वइसने ओखर डंडा गिल्ली होय. कबड्डी, खो-खो, गेंड़ी-दउड़, बांटी, बिल्ल्स, फुगड़ी, तरह-तरह के दउड़,डोरी खींच (रस्साकसी), डंडा-पिचरंगा छू-छूवउल(कई परकार के), पुक, नदी-पहाड़, झाड़-बेंदरा, रिंग-ढुलाना, घरगुन्दिया, छेरी-बाघ, खिस्सूल आदि कतको खेल खेले हन. छोटे बड़े सब खेलें, कूदें. तबियत दुरूस्त राहय. भतिजा-‘कका तब तो तुमन खेलते-खेलत जवान होगे होहू ? तुहंर समे खेल म खूब बितिस होही. पढ़ो कब गा ?’ कका-‘बेटा हमन त चकमक पथरा ल पोनी (कपास) म रगड़ के आगी पैदा करे के समे ल देखे हन. घरो घर गोरसी होय.गोरसी म छेना(कंडा) खुसेर(राख के भीतर)के रखे जाय. एक-दूसर के घर छेना म आगी मांगे तब चूलहा सुलगे.

चिमनी-कंदील के जमाना
चिमनी-कंदील के जमाना रिहिस. कभू माटी तेल मिलय कभू नइ मिलय. एक ठन चिमनी या कंदील के अंजोर म पढ़ई लिखई, खाना बनई अउ सबो बुता होय बिजली सालों-साल बाद गाँव-गाँव म पहुंचिस. टांक अउ राजा पेंन के जमाना रिहिस. स्याही के टिकिया ल पानी म घोर के ओखर उपयोग करे जाय’. भतिजा-‘ओह !! देश-दुनिया आज कहाँ ले कहाँ पहूँचगे हे. हम ल गर्व हे. हम खूब तरक्की करे हन’. कका-‘हमर देश सोन चिरय्या रिहिस. अब के नवा पीढी खूब हुशियार हे. ज्ञान-बिज्ञान कम समे म खूब तरक्की करिस.बिजली, टेलीफोन अउ कम्प्यूटर, इंटरनेट ले देश-दुनिया बदलगे. भतिजा-‘वाह वाह हम खेल खेलत-खेलत सूचना-क्रांति के जुग म आगे हन. भतिजा -कका, आज त तेंहा खूब जादू देखाय गा ? राजनीति म घलो चौका-छक्का जमात हस. मेंह जावत हंव बासी खा के स्कूल जाहूँ दाई रद्दा देखत होही.

(शत्रुघन सिंह राजपूत छत्तीसगढ़ी के जानकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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